स्याह इंद्रधनुष और चाँदनी रातें

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कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ ।

Shaam

मेरी पीठ पीछे, शाम तुम ढली जाती हो,
मैं जानता हूँ कि तुम चली जाती हो,
फ़िसलते-लुढ़कते इस सूरज के साथ,
सामने से घिरी आ रही है रात ।

मगर रात भी तो मेहमान है
बस रात भर की ही, चली जाएगी,
जैसे जीवन में आते-जाते हैं सुख-दु:ख,
जन्म मृत्यु, यौवन-बुढ़ापा, श्वास-नि:श्वास ।

सुहानी शाम तुम रात में अंगडा़ईयाँ ले कर
कल सुबह की गोद में दम तोड़ दोगी,
कल शाम मैं किसी और शाम के साए में,
यूँ तस्वीर खिंचाता नज़र आऊंगा ।

या जाने, कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ ।

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कमीने (फ़िल्म नहीं, मेरी कविता)

मैं भी भूल गया वो बात,
तुम भी भूले ही होगे
अपने आप से किए हुए ऐसे वादे,
अपना जीवन समर्पित कर देने के ।

समर्पण, विपन्न बीलकों का जीवन
संवार देने में स्वयं का,
या आश्रय देने का निराश्रित
कई बडे़-बूढों को कहीं पर ।

वादे, जो किये थे हमने
अपने आप से हर बार,
चाय की दुकान पर अपने आगे हाथ फैलाए
नन्हे हाथों को देख कर ।

इरादे, जो बनाए थे हमने
४० में रिटायर हो जाने के, और,
शहर से दूर किसी पहाड़ पर हरियाली में
बच्चों के लिये मुफ़्त स्कूल खोलेने के ।

शर्म आयी होगी तुमको भी
रेल्वे की कोच में घुटनों पर रेंग के,
झाड़ू लगा भीख मांगने वाले को देख,
अपने पास इतना कुछ होने पर ।

फिर सोचा होगा तुमने जानबूझ कर,
कल की मीटिंग के बारे में,
ऑफ़िस, नये खुले मॉल के बारे में,
और किया होगा एक वादा फिर से ।

वादा ४० में रिटायर होने का,
स्कूल का, वृद्धाश्रम का,
सोचा होगा नन्हें भिखारी हाथों के बारे में,
और चल दिये होगे आगे – कमीने ।

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प्यास और आस

बहुत पहले लिखी थी यह कविता और साथ में यह भी लिखा था कि काश यह कविता अधूरी ही रहे हमेशा । एक अन्जान सा डर समा गया है दिल में, कहीं मेरा यह सपना भी अधूरा न रह जाए ।

मन रे, ये जो है तेरे भीतर की प्यास,
वैशाख में ज्यों हो श्रावण की तुझको आस ।

ज्यों कृष्ण पक्ष में पूर्ण चन्द्र को तरसे तू,
ज्यों नमी हवा में ढूंढे जब चलती हो लू ।

सूख चुकी छाती में जैसे ढूंढता पय शिशु,
सूने घर के द्वार खड़ा हो जैसे आस लगाए भिक्षु ।

ज्यों दुर्वासा से क्षमा की आस रखे अम्बरीष,
हथेली पर अपनी ज्यों थामना चाहे कोई गिरीश ।

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फिर जी लूँ एक बार

चल पड़े हम अपने रास्ते, मैं इधर, तुम उस ओर,
ज़िन्दगी किसी मोड़ पर तुम मुड़ गईं कहीं और ।

कभी बादलों से जब धूप की कोई किरण झांकती है,
किसी मोड़ पर तुम्हारे फिर मिल जाने की एक आस जागती है ।

एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार ।

अपने पैर घसीटते हुए कब तक चल पाऊंगा लगातार,
फट न पड़ें छाले, कहीं बैठ न जाऊं हो कर लाचार ।

मुझे बचा लेना ज़िन्दगी मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर,
मौत से पहले तुम्हें जी लेना चाहता हूँ एक बार ।

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Laughter – मेरे यार की हंसी !

Laughter

यार तुम्हारे साथ, जीवन है आनन्द भरा,
धरती और अम्बर में फैला, रंग जैसे हरा ।
कोई छोटा-बड़ा नहीं, न कुछ तेरा-मेरा,
जीवन का सहारा मेरा, ये कंधा तेरा ।।

कई आऎंगे, और चले जाऎंगे भी कई,
कुछ देर खड़े रह कर संग मुस्काऎंगे कई।
पर तू रहेगा सदा, और संग मुस्काऎगा सदा,
और तब भी जब सब चले जाऎंगे, देंगे धता ।।

याद रख़ना सदा, साथ है लंबा तेरा और मेरा,
और चाहीयेगा कंधा, मुझे तेरा या तुझे मेरा।
कौन सो जाए सदा की नींद, तू पहले या मैं पहले,
तब तक आ ऐ दोस्त हम हंस लें, खूब जी लें ॥

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तुम बिन

जीवन,
क्षणभंगुर।
स्मृतियां,
अमर।

तुम संग,
जीवन।
तुम बिन
जीवन बदरंग।

जीवन
सर्प दंश सा।
एक चीत्कार
मौन सा।

एक घुटी हुई
सांस सा,
टूटी हुई,
कई आस सा।

अंधे हुए
एक चक्षु सा,
लुटे हुए
एक भिक्षु सा।

जीवन
एक मौत सा
साक्षी
तेरी मौत का।

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तुम चले गये

तुम चले गए
तो चली गई रौशनी
अब सामने क्या खडा़
दिख़ता नहीं|

और चली गई
धूप से गर्मी,
ओस से नमी गई,
शरीर से नहीं प्राण|

समझ भी
और सोच भी रुक गई,
बार बार बस
तेरे चेहरे तक जा कर|

और तेरा चेहरा भी तो
एक याद बना रह गया,
तेरी मुस्कान
समय में चिपका एक लम्हा बना रह गया|

मैं हूं खड़ा
उस रास्ते पर,
जहां से हम गुज़रे थे
जहां कभी थी रौशनी|

कभी सोचा न था
ऐसी एक कविता भी लिखूंगा मैं
तुम चले जाओगे
तुम्हारी तस्वीर पर सर रख़ कर रोऊंगा मैं|

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स्याह इन्द्रधनुष – चांदनी रात

प्रियवर, इस ब्लॉग का प्रयोग मैं अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिये करता हूं और आप का स्वागत है मेरे अन्दर झांक कर देख लेने के लिये ।
आम तौर पर मैं कविता के माध्यम से अपने आपको व्यक्त करता हूं, मैं हिंदी का पंडित नहीं हूं, त्रूटि हो जाने पर कृपया उसे मेरे ध्यान में लायें एवं मुझे क्षमा करें ।

Kerala - God's Own Country

Death – By Grey Rainbow

There is so much that we think we will be able to do in this life,
there is so much we want to believe we will accomplish.
And then comes death, suddenly, it comes to the person closest to your heart.
There is nothing after that, no dreams, no desires, there is nothing to be accomplished. One thing remains :
TIME - and you don't know how to kill it.

GOD

इस घट अन्तर बाग बगीचे,
इसी में सिरजनहारा|
इस घट अन्तर पारस मोती,
इसी में नौ लख तारा|
इस घट अन्तर सात समन्दर,
इसी में उठत फ़ौव्वारा|
इस घट अन्तर अनहत गूंजे,
इसी में सांई हमारा|

Kabir - God lives within, not without

कारवां गुज़र गया

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

(c) - श्री गोपाल दास नीरज ।

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