स्याह इंद्रधनुष और चाँदनी रातें

I think therefore I am …… I think !!! Cut the crap, I am here to write so that I get loads of traffic and I feel important ……

दूर किनारा है !

तुम भूले हो अंधियारे में राह किनारे की,
और घने बादलों में ध्रुव तारा भी छुपा हुआ,
बहते जाना धारा के संग लगता तो आसां है,
पर थामो पतवार नाविक दूर किनारा है |

दिल डूबा जाता है और याद प्रिय की आती है,
ठन्डे थपेड़ों में भीग तन-मन कांप जाता है,
मचलती हैं मछलियाँ जल में, बाजुओं में भी,
खेते जाओ नाविक अभी दूर किनारा है |

ले रौशनी खड़े हो कर चट्टान पर किनारे की,
तेरी बाट जोहते होंगे जो रखते होंगे सारोकार
लहरों के उठने बैठने पर आस टूटती-बंधती होगी,
तुझे रखनी है आस नाविक दूर किनारा है |

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कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ ।

Shaam

मेरी पीठ पीछे, शाम तुम ढली जाती हो,
मैं जानता हूँ कि तुम चली जाती हो,
फ़िसलते-लुढ़कते इस सूरज के साथ,
सामने से घिरी आ रही है रात ।

मगर रात भी तो मेहमान है
बस रात भर की ही, चली जाएगी,
जैसे जीवन में आते-जाते हैं सुख-दु:ख,
जन्म मृत्यु, यौवन-बुढ़ापा, श्वास-नि:श्वास ।

सुहानी शाम तुम रात में अंगडा़ईयाँ ले कर
कल सुबह की गोद में दम तोड़ दोगी,
कल शाम मैं किसी और शाम के साए में,
यूँ तस्वीर खिंचाता नज़र आऊंगा ।

या जाने, कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ ।

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हाट – The Sunday Market

Village Haat

सुबह से ले के शाम तक,
जूतों से ले के गेहूं- दाल तक,
सब खरीदते-बेचते हैं ठाठ में
भीड़ भरी इतवार की हाट में ।

वहां चने भी हैं और खिलौने लकड़ी के,
मई मे जहां लगते हैं ठेले ककडी़ के,
सिक रहीं हैं मूंगफलीयां चटर-चटर
बिक रहे किलो के भाव से मटर।

लाल पीली बंधी सिरों पे पगडी़यां ,
चल रही डाल पैरों में जूतीयां
एक तीली से जला रहे दो बीड़ीयां,
ठंड है, खरीद रहे सस्ती सिगड़ीयां ।

हंस रहा है कालू और उसका बाप भी,
जब नाचे बंदर लय में ढोलक के थाप की ।
समेट रहे कुछ सामान, कुछ गिन रहे दिहाडी़,
कुछ चल पडे़ हैं पकड़ने गांव की गाड़ी।

कई चल पडे़ संजो के हफ़्ते भर के सपने,
पल जाऐंगे सात दिन कुटुम्बी और अपने ।
सब खुश हैं कर ली है एक और हफ़्ते की जुगाड़,
सब आज में ही जीते हैं, जीवन नहीं पहाड़ ।

The above photograph is a copyright of Rakesh Ranjan, it is reproduced here with his permission. Click here or photograph to visit the source.

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ज़िन्दगी पर दो

——पहली——

(जोगिन्दर साहब, आप से आज हुई बातों से प्रेरित । आपके आगरे के घर की दीवारों पर उभर आई पपड़ीयों को समर्पित)

दबे पैर निकली जा रही हो,
तुम तेज़ रफ़्तार से चलकर
मेरे कदमों के नीचे से
चुपचाप – ज़िन्दगी ।

ज़रा रुको तो, दम तो लो,
अभी बचपन भी नहीं जीया,
कहानीयां सब सुनी नहीं,
नहीं खेला खेल जी भरकर अभी ।

सपने देखे भी नहीं रंगीं,
मन भर नहीं हुई होली-दिवाली,
पिता के कंधों पर बैठ दशहरे पर
अभी देखने हैं जलते रावण कई ।

तुम तो चली जा रही हो,
मुड़ कर भी क्या देखोगी नहीं?
मुझे पसन्द थे वो दिन,
मगर वो तो तुम लौटाओगी नहीं !

यौवन भी बीता जाएगा,
तेरा चक्र चलता जाएगा,
पता नहीं कहाँ पहुँचूंगा मैं,
जाने तू कहाँ ले जाएगी ।

अधेड़ से बूढ़ा फिर एक याद,
फिर तो राख भी खो जाएगी,
क्या उसके बाद भी है कोई सफ़र
वक्त की धार ही बताएगी ।

——–छोटी सी दूसरी——-

मैं क्या करूँ, तेरा क्या करूँ,
तेरे साथ मैं ऐसा क्या करूँ
कि जब तू न रहे तो भी यह रहे
मैनें तेरे साथ, ज़िन्दगी, इन्साफ़ किया ।

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कमीने (फ़िल्म नहीं, मेरी कविता)

मैं भी भूल गया वो बात,
तुम भी भूले ही होगे
अपने आप से किए हुए ऐसे वादे,
अपना जीवन समर्पित कर देने के ।

समर्पण, विपन्न बीलकों का जीवन
संवार देने में स्वयं का,
या आश्रय देने का निराश्रित
कई बडे़-बूढों को कहीं पर ।

वादे, जो किये थे हमने
अपने आप से हर बार,
चाय की दुकान पर अपने आगे हाथ फैलाए
नन्हे हाथों को देख कर ।

इरादे, जो बनाए थे हमने
४० में रिटायर हो जाने के, और,
शहर से दूर किसी पहाड़ पर हरियाली में
बच्चों के लिये मुफ़्त स्कूल खोलेने के ।

शर्म आयी होगी तुमको भी
रेल्वे की कोच में घुटनों पर रेंग के,
झाड़ू लगा भीख मांगने वाले को देख,
अपने पास इतना कुछ होने पर ।

फिर सोचा होगा तुमने जानबूझ कर,
कल की मीटिंग के बारे में,
ऑफ़िस, नये खुले मॉल के बारे में,
और किया होगा एक वादा फिर से ।

वादा ४० में रिटायर होने का,
स्कूल का, वृद्धाश्रम का,
सोचा होगा नन्हें भिखारी हाथों के बारे में,
और चल दिये होगे आगे – कमीने ।

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चाँदनी की बातें

कितना झीना है आज आसमाँ में चाँद,
निकलो बाहर तो एक नज़र देखना उसे ।

देखोगी इस नज़ारे को तुम जो आज,
तो जान जाओगी, कैसी दिखती हो मेरे खयालों में मुझे ।

“जहाँ हूँ मैं, जहाँ खडी़ हूँ मैं,
दिखता नहीं चाँद, देखती हूँ मैं” ।

मेरी नज़रें तुम आज़माओ, आओ करीब आ जाओ,
देखो मेरी बाहें थाम, ज़मीन पर भी नज़र आएगा चाँद ।

या एक छोटा सा करो यह काम,
आईना देखो अगर देखना है चाँद ।

“चाँद की रोशनी हूँ मैं,
चाँद के बिना अधूरी हूँ मैं” ।

तो मुझे बना लो अपना चाँद तुम,
सीने से लगा लो, सारी दुनिया में फ़ैल जाओ तुम ।

“तुम ही तो हो, वो तुम ही हो प्राण,
हमदम मेरे, तुम ही मेरे चाँद” ।

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प्यास और आस

बहुत पहले लिखी थी यह कविता और साथ में यह भी लिखा था कि काश यह कविता अधूरी ही रहे हमेशा । एक अन्जान सा डर समा गया है दिल में, कहीं मेरा यह सपना भी अधूरा न रह जाए ।

मन रे, ये जो है तेरे भीतर की प्यास,
वैशाख में ज्यों हो श्रावण की तुझको आस ।

ज्यों कृष्ण पक्ष में पूर्ण चन्द्र को तरसे तू,
ज्यों नमी हवा में ढूंढे जब चलती हो लू ।

सूख चुकी छाती में जैसे ढूंढता पय शिशु,
सूने घर के द्वार खड़ा हो जैसे आस लगाए भिक्षु ।

ज्यों दुर्वासा से क्षमा की आस रखे अम्बरीष,
हथेली पर अपनी ज्यों थामना चाहे कोई गिरीश ।

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निगाहों के सपने – चाँदनी की आवाज़

सपने ये निगाहों के सच हों न हों,
ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों ।

ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में,
तेरे दिल में मेरे लिये जगह हो न हो ।

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मिल जाऐं नज़रें तो है ये दरिया आग का

कोई नज़रें मिलाने भी नही देता है,
हमारी नज़रों का रुख देख कर मुँह फेर लेता है ।

शायद यह सोच कर कि,
कहीं उसकी निगाहों की गहराई न नाप लें हम,
या कि यह सोच कर की,
हमारी निगाहों में भी वही गहराईयाँ न हों ।

पता नहीं कब तक चलेगा,
ये निगाहों का खेल,
और किस अन्जाम पर पहुँचेगा,
ये भी नहीं पता ।

पर चलने दो इसे,
है ये खेल आग का,
मिल जाऐं नज़रें
तो है ये दरिया आग का ।

जलूँगा ऐसे भी और
वैसे भी दहकेगा सीना,
ये हुआ तो जी लूँगा, और वो भी हुआ,
तो यह जीना भी है कौन सा जीना

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कुछ यूँ ही

———१———–

क्या नाम दिया तुमने मुझको,
सारी बस्ती में कर दिया बदनाम मुझको ।

जो दिया ही है तो रखेंगे सम्भालकर इसको,
बहुत दिन हुए, किसी ने कुछ दिया नहीं ईनाम मुझको ।

——–२———–

किसी ने कहा –
नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा,
मेरी आवाज़ ही पहचान है, ग़र याद रहे ।

तो किसी ने कहा –
तुम्हारी आवाज़ भी तो ना सुन पाए मन भर के,
तुम्हारे लिखे खत ज़रूर याद रहेंगे ।

नाम गुमे दुनिया से या बदल जाए चेहरा,
तुम्हारा अक्स अपने ज़हन में रखेंगे सम्भाल के ।

—————————————-

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स्याह इन्द्रधनुष – चांदनी रात

प्रियवर, इस ब्लॉग का प्रयोग मैं अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिये करता हूं और आप का स्वागत है मेरे अन्दर झांक कर देख लेने के लिये ।
आम तौर पर मैं कविता के माध्यम से अपने आपको व्यक्त करता हूं, मैं हिंदी का पंडित नहीं हूं, त्रूटि हो जाने पर कृपया उसे मेरे ध्यान में लायें एवं मुझे क्षमा करें ।

Kerala - God's Own Country

Death – By Grey Rainbow

There is so much that we think we will be able to do in this life,
there is so much we want to believe we will accomplish.
And then comes death, suddenly, it comes to the person closest to your heart.
There is nothing after that, no dreams, no desires, there is nothing to be accomplished. One thing remains :
TIME - and you don't know how to kill it.

GOD

इस घट अन्तर बाग बगीचे,
इसी में सिरजनहारा|
इस घट अन्तर पारस मोती,
इसी में नौ लख तारा|
इस घट अन्तर सात समन्दर,
इसी में उठत फ़ौव्वारा|
इस घट अन्तर अनहत गूंजे,
इसी में सांई हमारा|

Kabir - God lives within, not without

कारवां गुज़र गया

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

(c) - श्री गोपाल दास नीरज ।

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