स्याह इंद्रधनुष और चाँदनी रातें

I think therefore I am …… I think !!! Cut the crap, I am here to write so that I get loads of traffic and I feel important ……

चजइ रेणु – गंगा किनारे की रेत

सुबह-सुबह घूम रहा था, गंगा के किनारे-किनारे,
देख रहा था बह चली कुछ रेत, तट के सहारे-सहारे ।

“ओह, कहां चल दीं तुम, तुमको ही रहा मैं देख”
कह,उठा, गाल पर लगा ली गंगा की कुछ गीली रेत ।

वह बोली ” रेणु हूं मैं, मुझमें क्या देखा तुमने,
पगतल में रहती हूं, मुझमें क्या देखा तुमने”?

“सरित प्रवाह में बहती हूं, दूर चली जाती हूं,
टूट बिखर कर बनी हूं मैं, मुझमें क्या देखा तुमने”?

“तुम शीतल हो”, बोला मैं, “भीतर से जलता हूं मैं,
भागीरथी सी तुम गंभीर, बिन जल मछ्ली तड़पता मैं।

“हो गंगा के संग बहती तुम, शिला की तरह डूबता मैं,
टूट कर भी बनी हुई हो, टुकड़े बन बिखरता मैं”।

“तुम कहती हो मुझसे – तुममें क्या देखा मैनें,
तुम्हारे ही शीतल स्पर्श से जीवन को जीता हूं मैं”।

चाहता हूं गिर कर तुझपर, तेरे सीने से लग जाऊं,
या उठाऊं हाथों में तुझको, शिरोधार्य बैठाऊं” ।

“निष्प्राण हो गिर जाऊं जब, कोई गंगा में बहा दे मुझे,
तिल-तिल कर टूटूं-बिखरूं, रेणु में मिल जाऊं मैं” ।

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मां, तू जब न होगी कल

बहुत समय पहले बचकानी सी यह कविता लिखी थी, पर मां पर कविता बच्चे ही तो लिखेंगे। और जब बच्चे लिखेंगे तो वह बचकानी नहीं तो और क्या होगी? यह तब लिखी गयी थी जब मैं अपनी मां से दूर किसी और शहर में था और पता नहीं क्यों यह ख़याल आया कि कल अगर मेरी मां इस दुनिया में नहीं होगी तो क्या होगा | कविता पढे़ :

फिर बादल घनेरे घिर आये
मां की मेरी याद लाये
फिर तड़पा उसके आंचल को
उसके बोलों सी ठंडक ले आये

मां, तुम बादल सी मुझको लगती हो
तपते दिल पर ठंडक सी लगती हो,
बादल के बनते कई रूपों में
मेरे बचपन की कहानीयां लगती हो।

तुम्हारी कहानीयां याद आती हैं मां,
वो बंदर, शेर, खरगोश और मछ्लीयां,
आज फिर सो जाऊं तेरी गोद में,
मां फिर से मुझे वो कहानीयां सुना

जीवन मे जब न होगी तू कल
कैसे बीतेंगे मेरे वो पल,
चल मां, मेरी ऊंगली को पकड़
कुछ दूर साथ तू चल।

Filed under: मां, Hindi Poetry, Hindi Songs, Kavita, mother, Poetry

तुम सो न जाना प्रिये लेकिन

यह उन दिनों लिखी थी जब हम मिले ही थे । मैं उसे एस एम एस भेजता था पर वह सो जाया करती थी, पगली ! यह एस एम एस ही मेरे प्रेम पत्र हुआ करते थे, मेरी पातियां हुआ करते थे प्यार भरे। अपनी यादों को ताज़ा करने के लिये मैं यह कविता यहां लिख रहा हूं, यह कविता मैने एक रात उसके सो जाने के बाद उसे लिख भेजी थी, तब मैं उसकी इस सो जाने की आदत से बहुत निराश हो गया था यहां तक कि यह भी सोच बैठा था कि उसे मुझसे प्रेम नहीं। मैं नहीं जानता था तब कि इतनी जल्दी वह हमेशा के लिये सो जाएगी, खै़र —

क्या निद्रा देवी का करती हो आराधन,
या मुझमें रत करती अपना मन।

क्या सो चुकी देखती हो सपने,
या याद में मेरी लगी हो तपने।

हां लगता है सो चुकी हो
मैं लिखूंगा पाति भूल चुकी हो।

चलो मगर कोई बात नहीं है,
प्रिये, जीवन की यह अन्तिम रात नहीं है।

फिर आएगी कल रात नई,
साथ अपने ले ख्वाब कई।

फिर लिखूंगा कल बात नई,
खोलूंगा दिल के राज़ कई।

एक इन्तज़ा है मेरी लेकिन,
तुम सो न जाना प्रिये लेकिन।

तुम सो न जाना प्रिये लेकिन,
तुम सो न जाना प्रिये लेकिन।

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स्याह इन्द्रधनुष – चांदनी रात

प्रियवर, इस ब्लॉग का प्रयोग मैं अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिये करता हूं और आप का स्वागत है मेरे अन्दर झांक कर देख लेने के लिये ।
आम तौर पर मैं कविता के माध्यम से अपने आपको व्यक्त करता हूं, मैं हिंदी का पंडित नहीं हूं, त्रूटि हो जाने पर कृपया उसे मेरे ध्यान में लायें एवं मुझे क्षमा करें ।

Kerala - God's Own Country

Death – By Grey Rainbow

There is so much that we think we will be able to do in this life,
there is so much we want to believe we will accomplish.
And then comes death, suddenly, it comes to the person closest to your heart.
There is nothing after that, no dreams, no desires, there is nothing to be accomplished. One thing remains :
TIME - and you don't know how to kill it.

GOD

इस घट अन्तर बाग बगीचे,
इसी में सिरजनहारा|
इस घट अन्तर पारस मोती,
इसी में नौ लख तारा|
इस घट अन्तर सात समन्दर,
इसी में उठत फ़ौव्वारा|
इस घट अन्तर अनहत गूंजे,
इसी में सांई हमारा|

Kabir - God lives within, not without

कारवां गुज़र गया

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

(c) - श्री गोपाल दास नीरज ।

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