फिर जी लूँ एक बार

•April 5, 2008 • 3 Comments

चल पड़े हम अपने रास्ते, मैं इधर, तुम उस ओर,
ज़िन्दगी किसी मोड़ पर तुम मुड़ गईं कहीं और ।

कभी बादलों से जब धूप की कोई किरण झांकती है,
किसी मोड़ पर तुम्हारे फिर मिल जाने की एक आस जागती है ।

एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार ।

अपने पैर घसीटते हुए कब तक चल पाऊंगा लगातार,
फट न पड़ें छाले, कहीं बैठ न जाऊं हो कर लाचार ।

मुझे बचा लेना ज़िन्दगी मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर,
मौत से पहले तुम्हें जी लेना चाहता हूँ एक बार ।

the picture above in this post is licensed under the Creative Commons Attribution ShareAlike license versions 2.5, 2.0, and 1.0
For the source of the image click here

Stranger

•April 5, 2008 • No Comments

The Heart of your soul is what I want to discover,
Things which give you joy, I want to uncover.

Want to know what gives you a smile and a bother,
want to know you stranger

want to know you, and you I want to hear,
long it may take, but not always will you be a stranger.

Hey stranger, I know you will come here and this is for you. I have edited this a bit from the original.

मौत जब तू आना - मेरी आवाज़ में

•March 30, 2008 • No Comments

यह मेरी लिखी एक कविता है, मेरी ही आवाज़ में जिसकी लिंक नीचे दी गई है :

Maut Jab Tu Aana

582px-death_woman.jpg

Some Rights Reserved for the picture above

This image was originally posted to Flickr by wimayr at http://flickr.com/photos/45295883@N00/47525464.

क्या करूं

•March 28, 2008 • 1 Comment

——–(१)——–

क्या करूं, क्या आत्मघात ?
कैसे कटे रात ?
कहीं तो समझे कोई
रोज मुझ पर रोती रात ।

मन में - भाव-शून्यता
या किंकर्तव्यविमूढ़ता
चहुं ओर शोर
हर कोई मुझे कोसता ।

——-(२)——-

क्या कुछ न खो दिया,
रंगों को भी तो धो दिया
हड्डीयों को भी तो हमने
कुरेद के देख लिया ।

अपना लहू भी बहा दूँ क्या,
कटार ही चला लूँ क्या,
पर बह गया सभी तो
जिस्म में जलेगा क्या ?

होली एस एम एस

•March 23, 2008 • 1 Comment

मित्र मेरे,
छोटा सा पत्र तुम्हें
लिख रहा हूं
आज होली है ।

जीवन है,
कई रंग हैं उसमें
एक रंग उसमे
तुमसे है ।

उस रंग जैसा,
दूजा रंग नहीं,
तेरा रंग
इतना जुदा सा है ।

written for some very special people in my life. It was Holi yesterday. I can see a few colours in my life, but will they stay, will they actually embrace me ?

दहलीज़

•March 3, 2008 • 1 Comment

किसी ने लिख भेजी यह, एक छोटे से एस एम एस में, पता नहीं किसने लिखी है पर अच्छी लगी और कहीं भूल न जाऊं इसलिये :

फिर हमें क्यों तेरी देहलीज़ याद आ गयी,
जब लाखों खयाल सीढी़यां चढ़ते उतरते हैं ।

अकेलापन

•February 15, 2008 • 2 Comments

जीवन की सबसे बड़ी बीमारी है अकेलापन। यह कैंसर जैसा है, अन्दर ही अन्दर आदमी को कब खोख़ला बना देता है पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तो बहुत देर हो चुकी होती है।

चजइ रेणु - गंगा किनारे की रेत

•January 13, 2008 • 2 Comments

सुबह-सुबह घूम रहा था, गंगा के किनारे-किनारे,
देख रहा था बह चली कुछ रेत, तट के सहारे-सहारे ।

“ओह, कहां चल दीं तुम, तुमको ही रहा मैं देख”
कह,उठा, गाल पर लगा ली गंगा की कुछ गीली रेत ।

वह बोली ” रेणु हूं मैं, मुझमें क्या देखा तुमने,
पगतल में रहती हूं, मुझमें क्या देखा तुमने”?

“सरित प्रवाह में बहती हूं, दूर चली जाती हूं,
टूट बिखर कर बनी हूं मैं, मुझमें क्या देखा तुमने”?

“तुम शीतल हो”, बोला मैं, “भीतर से जलता हूं मैं,
भागीरथी सी तुम गंभीर, बिन जल मछ्ली तड़पता मैं।

“हो गंगा के संग बहती तुम, शिला की तरह डूबता मैं,
टूट कर भी बनी हुई हो, टुकड़े बन बिखरता मैं”।

“तुम कहती हो मुझसे - तुममें क्या देखा मैनें,
तुम्हारे ही शीतल स्पर्श से जीवन को जीता हूं मैं”।

चाहता हूं गिर कर तुझपर, तेरे सीने से लग जाऊं,
या उठाऊं हाथों में तुझको, शिरोधार्य बैठाऊं” ।

“निष्प्राण हो गिर जाऊं जब, कोई गंगा में बहा दे मुझे,
तिल-तिल कर टूटूं-बिखरूं, रेणु में मिल जाऊं मैं” ।

मां, तू जब न होगी कल

•January 9, 2008 • 5 Comments

बहुत समय पहले बचकानी सी यह कविता लिखी थी, पर मां पर कविता बच्चे ही तो लिखेंगे। और जब बच्चे लिखेंगे तो वह बचकानी नहीं तो और क्या होगी? यह तब लिखी गयी थी जब मैं अपनी मां से दूर किसी और शहर में था और पता नहीं क्यों यह ख़याल आया कि कल अगर मेरी मां इस दुनिया में नहीं होगी तो क्या होगा | कविता पढे़ :

फिर बादल घनेरे घिर आये
मां की मेरी याद लाये
फिर तड़पा उसके आंचल को
उसके बोलों सी ठंडक ले आये

मां, तुम बादल सी मुझको लगती हो
तपते दिल पर ठंडक सी लगती हो,
बादल के बनते कई रूपों में
मेरे बचपन की कहानीयां लगती हो।

तुम्हारी कहानीयां याद आती हैं मां,
वो बंदर, शेर, खरगोश और मछ्लीयां,
आज फिर सो जाऊं तेरी गोद में,
मां फिर से मुझे वो कहानीयां सुना

जीवन मे जब न होगी तू कल
कैसे बीतेंगे मेरे वो पल,
चल मां, मेरी ऊंगली को पकड़
कुछ दूर साथ तू चल।

हाट - The Sunday Market

•January 6, 2008 • 6 Comments

सुबह से ले के शाम तक,
जूतों से ले के गेहूं- दाल तक,
सब खरीदते-बेचते हैं ठाठ में
भीड़ भरी इतवार की हाट में ।

वहां चने भी हैं और खिलौने लकड़ी के,
मई मे जहां लगते हैं ठेले ककडी़ के,
सिक रहीं हैं मूंगफलीयां चटर-चटर
बिक रहे किलो के भाव से मटर।

लाल पीली बंधी सिरों पे पगडी़यां ,
चल रही डाल पैरों में जूतीयां
एक तीली से जला रहे दो बीड़ीयां,
ठंड है, खरीद रहे सस्ती सिगड़ीयां ।

हंस रहा है कालू और उसका बाप भी,
जब नाचे बंदर लय में ढोलक के थाप की ।
समेट रहे कुछ सामान, कुछ गिन रहे दिहाडी़,
कुछ चल पडे़ हैं पकड़ने गांव की गाड़ी।

कई चल पडे़ संजो के हफ़्ते भर के सपने,
पल जाऐंगे सात दिन कुटुम्बी और अपने ।
सब खुश हैं कर ली है एक और हफ़्ते की जुगाड़,
सब आज में ही जीते हैं, जीवन नहीं पहाड़ ।