यह लिख भेजा था उसने मुझे, चाँदनी ने !
सपने ये निगाहों के सच हों न हों,
ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों ।
ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में,
तेरे लिये दिल में मेरे लिये जगह हो न हो ।
September 6, 2008 • 2:59 pm 0
September 4, 2008 • 4:13 pm 4
ए इन्द्रधनुष
रंग कई
तूने देखे
पर क्यों
तू स्याह रहा ?
क्यों तेरे
हर ओर सदा
रंग रहे
कई मगर
अंधियारे से तू घिरा रहा ?
देता है तू हरदम
और चाह
बहुत है पाने की
पर तुझको क्यों
कुछ नहीं मिला ?
ओस की बूँदें
किरण सूरज की
कुछ क्षणों
को मिलतीं हैं
तू बनता है
और खो जाता है
कुछ देर में
पता नहीं
कौन से
स्याह अन्धेरे कोने में
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• 3:26 pm 0
थोड़ा चुप रहो ए दिल
तुम क्यों बोल पड़ते हो बेवजह
तुम गलत होते हो सदा
हर मौके पर हर जगह ।
तुम्हें नहीं मौका
और ना तुम्हें हक है कोई
खामोश रहो और सुनो
हरदम सबकी कही ।
तुम बेजान बनो और
रहो दफ़न सदा
खाके बदन में मेरे बनकर
मुर्दे का सहारा मुर्दा ।
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July 27, 2008 • 4:34 pm 0
किस दुःश्चिन्ता में हृदय तुम्हारा
रेखाऎं कई तुम्हारे मुख पर उकेरता,
तुम कहतीं नहीं कुछ मुझसे
पर मैं रेखाऎं पढ़ सकता हूँ ।
पीड़ बैठी, नीढ़ बना हृदय में
मुस्कान से लीपती तुम उसे,
तुम आँखें बन्द रखा करो,
मैं खिड़कीयों से झाँक लेता हूँ ।
मेरे प्रेम से लिखे शब्दों को पढ़ कर,
जब तुम्हारे नयनों से बहा था नीर,
क्यों मैं यह नही कह पाया कि मैं
अश्रुओं का कहा सुन लेता हूँ ।
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June 29, 2008 • 7:18 pm 0
Nothing remains ! Everything changes; fragrances fade away, the Sun sets, and the day falls into night.
Everyone has a free will and not even God interferes there. Saints of all ages have preached; love liberates, it does not bind. God liberates, so why should I not ?
May their be peace in all hearts !
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May 6, 2008 • 4:07 pm 4
तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।
रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।
गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिर्विहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की, प्रिय की बाहों में पूर्ण,
कल तुम भी होगी मेरे आलिंगन में, मैं तेरे प्रेम में चूर्ण ।
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April 23, 2008 • 7:51 pm 0
हर ओर तू ही तू है,
हर चीज़ तेरी परछाई,
मैनें जहाँ जहाँ भी देखा,
बस तू ही तू नज़र आई ।
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• 7:32 pm 1
कितना झीना है आज आसमाँ में चाँद,
निकलो बाहर तो एक नज़र देखना उसे ।
देखोगी इस नज़ारे को तुम जो आज,
तो जान जाओगी, कैसी दिखती हो मेरे खयालों में मुझे ।
“जहाँ हूँ मैं, जहाँ खडी़ हूँ मैं,
दिखता नहीं चाँद, देखती हूँ मैं” ।
मेरी नज़रें तुम आज़माओ, आओ करीब आ जाओ,
देखो मेरी बाहें थाम, ज़मीन पर भी नज़र आएगा चाँद ।
या एक छोटा सा करो यह काम,
आईना देखो अगर देखना है चाँद ।
“चाँद की रोशनी हूँ मैं,
चाँद के बिना अधूरी हूँ मैं” ।
तो मुझे बना लो अपना चाँद तुम,
सीने से लगा लो, सारी दुनिया में फ़ैल जाओ तुम ।
“तुम ही तो हो, वो तुम ही हो प्राण,
हमदम मेरे, तुम ही मेरे चाँद” ।
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April 14, 2008 • 2:09 pm 2
बहुत पहले लिखी थी यह कविता और साथ में यह भी लिखा था कि काश यह कविता अधूरी ही रहे हमेशा । एक अन्जान सा डर समा गया है दिल में, कहीं मेरा यह सपना भी अधूरा न रह जाए ।
मन रे, ये जो है तेरे भीतर की प्यास,
वैशाख में ज्यों हो श्रावण की तुझको आस ।
ज्यों कृष्ण पक्ष में पूर्ण चन्द्र को तरसे तू,
ज्यों नमी हवा में ढूंढे जब चलती हो लू ।
सूख चुकी छाती में जैसे ढूंढता पय शिशु,
सूने घर के द्वार खड़ा हो जैसे आस लगाए भिक्षु ।
ज्यों दुर्वासा से क्षमा की आस रखे अम्बरीष,
हथेली पर अपनी ज्यों थामना चाहे कोई गिरीश ।
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April 10, 2008 • 4:59 pm 3
सपने ये निगाहों के सच हों न हों,
ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों ।
ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में,
तेरे दिल में मेरे लिये जगह हो न हो ।
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