चल पड़े हम अपने रास्ते, मैं इधर, तुम उस ओर,
ज़िन्दगी किसी मोड़ पर तुम मुड़ गईं कहीं और ।
कभी बादलों से जब धूप की कोई किरण झांकती है,
किसी मोड़ पर तुम्हारे फिर मिल जाने की एक आस जागती है ।
एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार ।
अपने पैर घसीटते हुए कब तक चल पाऊंगा लगातार,
फट न पड़ें छाले, कहीं बैठ न जाऊं हो कर लाचार ।
मुझे बचा लेना ज़िन्दगी मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर,
मौत से पहले तुम्हें जी लेना चाहता हूँ एक बार ।
the picture above in this post is licensed under the Creative Commons Attribution ShareAlike license versions 2.5, 2.0, and 1.0
For the source of the image click here









