स्याह इंद्रधनुष और चाँदनी रातें

I think therefore I am …… I think !!! Cut the crap, I am here to write so that I get loads of traffic and I feel important ……

निगाहों के सपने – चाँदनी की आवाज़

यह लिख भेजा था उसने मुझे, चाँदनी ने !

सपने ये निगाहों के सच हों न हों,
ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों ।

ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में,
तेरे लिये दिल में मेरे लिये जगह हो न हो ।

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, SMS, कविता ,

इन्द्रधनुष का अन्धेरा कोना

ए इन्द्रधनुष
रंग कई
तूने देखे
पर क्यों
तू स्याह रहा ?

क्यों तेरे
हर ओर सदा
रंग रहे
कई मगर
अंधियारे से तू घिरा रहा ?

देता है तू हरदम
और चाह
बहुत है पाने की
पर तुझको क्यों
कुछ नहीं मिला ?

ओस की बूँदें
किरण सूरज की
कुछ क्षणों
को मिलतीं हैं
तू बनता है

और खो जाता है
कुछ देर में
पता नहीं
कौन से
स्याह अन्धेरे कोने में

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, कविता

दिल तू दफ़न हो जा

थोड़ा चुप रहो ए दिल
तुम क्यों बोल पड़ते हो बेवजह
तुम गलत होते हो सदा
हर मौके पर हर जगह ।

तुम्हें नहीं मौका
और ना तुम्हें हक है कोई
खामोश रहो और सुनो
हरदम सबकी कही ।

तुम बेजान बनो और
रहो दफ़न सदा
खाके बदन में मेरे बनकर
मुर्दे का सहारा मुर्दा ।

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, कविता, दिल

मैं न सुन पाया

किस दुःश्चिन्ता में हृदय तुम्हारा
रेखाऎं कई तुम्हारे मुख पर उकेरता,
तुम कहतीं नहीं कुछ मुझसे
पर मैं रेखाऎं पढ़ सकता हूँ ।

पीड़ बैठी, नीढ़ बना हृदय में
मुस्कान से लीपती तुम उसे,
तुम आँखें बन्द रखा करो,
मैं खिड़कीयों से झाँक लेता हूँ ।

मेरे प्रेम से लिखे शब्दों को पढ़ कर,
जब तुम्हारे नयनों से बहा था नीर,
क्यों मैं यह नही कह पाया कि मैं
अश्रुओं का कहा सुन लेता हूँ ।

Filed under: Uncategorized

Nothing Remains !

Nothing remains ! Everything changes; fragrances fade away, the Sun sets, and the day falls into night.

Everyone has a free will and not even God interferes there. Saints of all ages have preached; love liberates, it does not bind. God liberates, so why should I not ?

May their be peace in all hearts !

Filed under: Uncategorized

निशा प्रिया

तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।

रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।

गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिर्विहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की, प्रिय की बाहों में पूर्ण,
कल तुम भी होगी मेरे आलिंगन में, मैं तेरे प्रेम में चूर्ण ।

The picture in this post has been taken by Ralf-Andre-Lettau. For full details click HERE

Filed under: Kavita, Poetry, कविता , ,

एक बार फिर यूँ

हर ओर तू ही तू है,
हर चीज़ तेरी परछाई,
मैनें जहाँ जहाँ भी देखा,
बस तू ही तू नज़र आई ।

Filed under: Uncategorized

चाँदनी की बातें

कितना झीना है आज आसमाँ में चाँद,
निकलो बाहर तो एक नज़र देखना उसे ।

देखोगी इस नज़ारे को तुम जो आज,
तो जान जाओगी, कैसी दिखती हो मेरे खयालों में मुझे ।

“जहाँ हूँ मैं, जहाँ खडी़ हूँ मैं,
दिखता नहीं चाँद, देखती हूँ मैं” ।

मेरी नज़रें तुम आज़माओ, आओ करीब आ जाओ,
देखो मेरी बाहें थाम, ज़मीन पर भी नज़र आएगा चाँद ।

या एक छोटा सा करो यह काम,
आईना देखो अगर देखना है चाँद ।

“चाँद की रोशनी हूँ मैं,
चाँद के बिना अधूरी हूँ मैं” ।

तो मुझे बना लो अपना चाँद तुम,
सीने से लगा लो, सारी दुनिया में फ़ैल जाओ तुम ।

“तुम ही तो हो, वो तुम ही हो प्राण,
हमदम मेरे, तुम ही मेरे चाँद” ।

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, SMS, कविता , ,

प्यास और आस

बहुत पहले लिखी थी यह कविता और साथ में यह भी लिखा था कि काश यह कविता अधूरी ही रहे हमेशा । एक अन्जान सा डर समा गया है दिल में, कहीं मेरा यह सपना भी अधूरा न रह जाए ।

मन रे, ये जो है तेरे भीतर की प्यास,
वैशाख में ज्यों हो श्रावण की तुझको आस ।

ज्यों कृष्ण पक्ष में पूर्ण चन्द्र को तरसे तू,
ज्यों नमी हवा में ढूंढे जब चलती हो लू ।

सूख चुकी छाती में जैसे ढूंढता पय शिशु,
सूने घर के द्वार खड़ा हो जैसे आस लगाए भिक्षु ।

ज्यों दुर्वासा से क्षमा की आस रखे अम्बरीष,
हथेली पर अपनी ज्यों थामना चाहे कोई गिरीश ।

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, कविता , , ,

निगाहों के सपने – चाँदनी की आवाज़

सपने ये निगाहों के सच हों न हों,
ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों ।

ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में,
तेरे दिल में मेरे लिये जगह हो न हो ।

The picture in this post is a faithful photographic reproduction of an original two-dimensional work of art. The original image comprising the work of art itself is in the public domain for the following reason:

This image (or other media file) is in the public domain because its copyright has expired.

This applies to the United States, Canada, the European Union and those countries with a copyright term of life of the author plus 70 years.

For details of this picture click here

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, कविता , , ,

स्याह इन्द्रधनुष – चांदनी रात

प्रियवर, इस ब्लॉग का प्रयोग मैं अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिये करता हूं और आप का स्वागत है मेरे अन्दर झांक कर देख लेने के लिये ।
आम तौर पर मैं कविता के माध्यम से अपने आपको व्यक्त करता हूं, मैं हिंदी का पंडित नहीं हूं, त्रूटि हो जाने पर कृपया उसे मेरे ध्यान में लायें एवं मुझे क्षमा करें ।

Watch videos at Vodpod and other videos from this collection.

Kerala - God's Own Country

DSC00884

DSC00716

DSC00691

More Photos

Death – By Grey Rainbow

There is so much that we think we will be able to do in this life,
there is so much we want to believe we will accomplish.
And then comes death, suddenly, it comes to the person closest to your heart.
There is nothing after that, no dreams, no desires, there is nothing to be accomplished. One thing remains :
TIME - and you don't know how to kill it.

GOD

इस घट अन्तर बाग बगीचे,
इसी में सिरजनहारा|
इस घट अन्तर पारस मोती,
इसी में नौ लख तारा|
इस घट अन्तर सात समन्दर,
इसी में उठत फ़ौव्वारा|
इस घट अन्तर अनहत गूंजे,
इसी में सांई हमारा|

Kabir - God lives within, not without

कारवां गुज़र गया

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

(c) - श्री गोपाल दास नीरज ।

Blog Stats

  • 6,837 hits

Add This

Bookmark and Share

Me On Twitter

  • कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ http://wp.me/p9oRG-3sस्याह - रंगीन2 months ago
  • When was it that you travelled in an Autorickshaw for 5 km and the auto walla demamnded on 5 Bucks ? For me it was todayस्याह - रंगीन2 months ago
  • Just posted this हाट - The Sunday Market http://wp.me/p9oRG-2Yस्याह - रंगीन2 months ago
  • @kumarmukul जी बहुत अच्छे, मेरी दाद कवि तक पहुँचाने का कष्ट करें । धन्यवाद !!!स्याह - रंगीन2 months ago
  • @kumarmukul मुकुल साहब आज रायपुर आना हुआ और आपका कविता पढ़्ना भी। अच्छा लिखा है आपनेस्याह - रंगीन2 months ago