स्याह इंद्रधनुष और चाँदनी रातें

I think therefore I am …… I think !!! Cut the crap, I am here to write so that I get loads of traffic and I feel important ……

कमीने (फ़िल्म नहीं, मेरी कविता)

मैं भी भूल गया वो बात,
तुम भी भूले ही होगे
अपने आप से किए हुए ऐसे वादे,
अपना जीवन समर्पित कर देने के ।

समर्पण, विपन्न बीलकों का जीवन
संवार देने में स्वयं का,
या आश्रय देने का निराश्रित
कई बडे़-बूढों को कहीं पर ।

वादे, जो किये थे हमने
अपने आप से हर बार,
चाय की दुकान पर अपने आगे हाथ फैलाए
नन्हे हाथों को देख कर ।

इरादे, जो बनाए थे हमने
४० में रिटायर हो जाने के, और,
शहर से दूर किसी पहाड़ पर हरियाली में
बच्चों के लिये मुफ़्त स्कूल खोलेने के ।

शर्म आयी होगी तुमको भी
रेल्वे की कोच में घुटनों पर रेंग के,
झाड़ू लगा भीख मांगने वाले को देख,
अपने पास इतना कुछ होने पर ।

फिर सोचा होगा तुमने जानबूझ कर,
कल की मीटिंग के बारे में,
ऑफ़िस, नये खुले मॉल के बारे में,
और किया होगा एक वादा फिर से ।

वादा ४० में रिटायर होने का,
स्कूल का, वृद्धाश्रम का,
सोचा होगा नन्हें भिखारी हाथों के बारे में,
और चल दिये होगे आगे – कमीने ।

Filed under: Kavita, Poetry, Random Thoughts, voice, कविता , , , , , ,

कुछ यूँ ही

———१———–

क्या नाम दिया तुमने मुझको,
सारी बस्ती में कर दिया बदनाम मुझको ।

जो दिया ही है तो रखेंगे सम्भालकर इसको,
बहुत दिन हुए, किसी ने कुछ दिया नहीं ईनाम मुझको ।

——–२———–

किसी ने कहा -
नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा,
मेरी आवाज़ ही पहचान है, ग़र याद रहे ।

तो किसी ने कहा -
तुम्हारी आवाज़ भी तो ना सुन पाए मन भर के,
तुम्हारे लिखे खत ज़रूर याद रहेंगे ।

नाम गुमे दुनिया से या बदल जाए चेहरा,
तुम्हारा अक्स अपने ज़हन में रखेंगे सम्भाल के ।

—————————————-

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, Random Thoughts, SMS, Urdu Poetry, कविता , , , ,

Stranger

The Heart of your soul is what I want to discover,
Things which give you joy, I want to uncover.

Want to know what gives you a smile and a bother,
want to know you stranger

want to know you, and you I want to hear,
long it may take, but not always will you be a stranger.

Hey stranger, I know you will come here and this is for you. I have edited this a bit from the original.

Filed under: English Poetry, Poetry, Random Thoughts, SMS , ,

क्या करूं

——–(१)——–

क्या करूं, क्या आत्मघात ?
कैसे कटे रात ?
कहीं तो समझे कोई
रोज मुझ पर रोती रात ।

मन में – भाव-शून्यता
या किंकर्तव्यविमूढ़ता
चहुं ओर शोर
हर कोई मुझे कोसता ।

——-(२)——-

क्या कुछ न खो दिया,
रंगों को भी तो धो दिया
हड्डीयों को भी तो हमने
कुरेद के देख लिया ।

अपना लहू भी बहा दूँ क्या,
कटार ही चला लूँ क्या,
पर बह गया सभी तो
जिस्म में जलेगा क्या ?

Filed under: Hindi Poetry, Poetry, Random Thoughts, कविता

दहलीज़

किसी ने लिख भेजी यह, एक छोटे से एस एम एस में, पता नहीं किसने लिखी है पर अच्छी लगी और कहीं भूल न जाऊं इसलिये :

फिर हमें क्यों तेरी देहलीज़ याद आ गयी,
जब लाखों खयाल सीढी़यां चढ़ते उतरते हैं ।

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, Random Thoughts, Urdu Poetry, कविता

अकेलापन

जीवन की सबसे बड़ी बीमारी है अकेलापन। यह कैंसर जैसा है, अन्दर ही अन्दर आदमी को कब खोख़ला बना देता है पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तो बहुत देर हो चुकी होती है।

Filed under: Random Thoughts ,

स्याह इन्द्रधनुष – चांदनी रात

प्रियवर, इस ब्लॉग का प्रयोग मैं अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिये करता हूं और आप का स्वागत है मेरे अन्दर झांक कर देख लेने के लिये ।
आम तौर पर मैं कविता के माध्यम से अपने आपको व्यक्त करता हूं, मैं हिंदी का पंडित नहीं हूं, त्रूटि हो जाने पर कृपया उसे मेरे ध्यान में लायें एवं मुझे क्षमा करें ।

Watch videos at Vodpod and other videos from this collection.

Kerala - God's Own Country

DSC00884

DSC00716

DSC00691

More Photos

Death – By Grey Rainbow

There is so much that we think we will be able to do in this life,
there is so much we want to believe we will accomplish.
And then comes death, suddenly, it comes to the person closest to your heart.
There is nothing after that, no dreams, no desires, there is nothing to be accomplished. One thing remains :
TIME - and you don't know how to kill it.

GOD

इस घट अन्तर बाग बगीचे,
इसी में सिरजनहारा|
इस घट अन्तर पारस मोती,
इसी में नौ लख तारा|
इस घट अन्तर सात समन्दर,
इसी में उठत फ़ौव्वारा|
इस घट अन्तर अनहत गूंजे,
इसी में सांई हमारा|

Kabir - God lives within, not without

कारवां गुज़र गया

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

(c) - श्री गोपाल दास नीरज ।

Blog Stats

  • 6,881 hits

Add This

Bookmark and Share

Me On Twitter

  • कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ http://wp.me/p9oRG-3sस्याह - रंगीन2 months ago
  • When was it that you travelled in an Autorickshaw for 5 km and the auto walla demamnded on 5 Bucks ? For me it was todayस्याह - रंगीन2 months ago
  • Just posted this हाट - The Sunday Market http://wp.me/p9oRG-2Yस्याह - रंगीन2 months ago
  • @kumarmukul जी बहुत अच्छे, मेरी दाद कवि तक पहुँचाने का कष्ट करें । धन्यवाद !!!स्याह - रंगीन3 months ago
  • @kumarmukul मुकुल साहब आज रायपुर आना हुआ और आपका कविता पढ़्ना भी। अच्छा लिखा है आपनेस्याह - रंगीन3 months ago