मैं भी भूल गया वो बात,
तुम भी भूले ही होगे
अपने आप से किए हुए ऐसे वादे,
अपना जीवन समर्पित कर देने के ।
समर्पण, विपन्न बीलकों का जीवन
संवार देने में स्वयं का,
या आश्रय देने का निराश्रित
कई बडे़-बूढों को कहीं पर ।
वादे, जो किये थे हमने
अपने आप से हर बार,
चाय की दुकान पर अपने आगे हाथ फैलाए
नन्हे हाथों को देख कर ।
इरादे, जो बनाए थे हमने
४० में रिटायर हो जाने के, और,
शहर से दूर किसी पहाड़ पर हरियाली में
बच्चों के लिये मुफ़्त स्कूल खोलेने के ।
शर्म आयी होगी तुमको भी
रेल्वे की कोच में घुटनों पर रेंग के,
झाड़ू लगा भीख मांगने वाले को देख,
अपने पास इतना कुछ होने पर ।
फिर सोचा होगा तुमने जानबूझ कर,
कल की मीटिंग के बारे में,
ऑफ़िस, नये खुले मॉल के बारे में,
और किया होगा एक वादा फिर से ।
वादा ४० में रिटायर होने का,
स्कूल का, वृद्धाश्रम का,
सोचा होगा नन्हें भिखारी हाथों के बारे में,
और चल दिये होगे आगे – कमीने ।
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