ओ नंगे ! हां तुम…… तुम नंगे,
अरे! फिर भी पढ़े जा रहे हो तुम अभद्र
नहीं मानोगे क्या तुम ?
तो सुनो तुम मनुष्य निर्वस्त्र !
तुम नग्न हो क्योंकि निर्लज्ज,
कह तो दिया, निर्लज्ज हो तुम,
मनुष्यों का अनादर करने में
दम्भी, आनन्द पाते हो तुम ।
रखो हृदय पर हाथ, सत्य कहो,
अधीनस्तों का अभिमानवश
दमन कर तुमने क्या,
नहीं छुआ अभिमान का उत्कर्ष ?
क्या तुम ठीक वैसे ही नहीं हो,
नगर भ्रमण करते नग्न विक्षिप्त से,
अपने आप ही हंसते हुए
मैले से, नंगे, सब लोगों मे घृणित से ?
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