तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।
रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।
गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की श्याम वर्ण करती वरण,
मैं अनिमेष देखता युगल को परस्पर पाते शरण ।
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बहुत उम्दा रचना!!!
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-समीर लाल
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