गंगा तुम क्यों जलती हो,
क्या उन पापों से जो धोए तुमने ?
या देख कर उन पापों को
जो होने को तैयार दिलों में ?
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September 21, 2008 • 8:52 am 2
September 6, 2008 • 3:16 pm 1
तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।
रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।
गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की श्याम वर्ण करती वरण,
मैं अनिमेष देखता युगल को परस्पर पाते शरण ।
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• 2:59 pm 0
September 4, 2008 • 4:13 pm 4
ए इन्द्रधनुष
रंग कई
तूने देखे
पर क्यों
तू स्याह रहा ?
क्यों तेरे
हर ओर सदा
रंग रहे
कई मगर
अंधियारे से तू घिरा रहा ?
देता है तू हरदम
और चाह
बहुत है पाने की
पर तुझको क्यों
कुछ नहीं मिला ?
ओस की बूँदें
किरण सूरज की
कुछ क्षणों
को मिलतीं हैं
तू बनता है
और खो जाता है
कुछ देर में
पता नहीं
कौन से
स्याह अन्धेरे कोने में
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• 3:26 pm 0
थोड़ा चुप रहो ए दिल
तुम क्यों बोल पड़ते हो बेवजह
तुम गलत होते हो सदा
हर मौके पर हर जगह ।
तुम्हें नहीं मौका
और ना तुम्हें हक है कोई
खामोश रहो और सुनो
हरदम सबकी कही ।
तुम बेजान बनो और
रहो दफ़न सदा
खाके बदन में मेरे बनकर
मुर्दे का सहारा मुर्दा ।
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