किस दुःश्चिन्ता में हृदय तुम्हारा
रेखाऎं कई तुम्हारे मुख पर उकेरता,
तुम कहतीं नहीं कुछ मुझसे
पर मैं रेखाऎं पढ़ सकता हूँ ।
पीड़ बैठी, नीढ़ बना हृदय में
मुस्कान से लीपती तुम उसे,
तुम आँखें बन्द रखा करो,
मैं खिड़कीयों से झाँक लेता हूँ ।
मेरे प्रेम से लिखे शब्दों को पढ़ कर,
जब तुम्हारे नयनों से बहा था नीर,
क्यों मैं यह नही कह पाया कि मैं
अश्रुओं का कहा सुन लेता हूँ ।
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