May 6, 2008...4:07 pm
निशा प्रिया
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तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।
रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।
गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिर्विहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की, प्रिय की बाहों में पूर्ण,
कल तुम भी होगी मेरे आलिंगन में, मैं तेरे प्रेम में चूर्ण ।
The picture in this post has been taken by Ralf-Andre-Lettau. For full details click HERE








1 Comment
May 6, 2008 at 5:04 pm
बहुत बढ़िया.
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