निशा प्रिया

6 05 2008

तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।

रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।

गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिर्विहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की, प्रिय की बाहों में पूर्ण,
कल तुम भी होगी मेरे आलिंगन में, मैं तेरे प्रेम में चूर्ण ।

The picture in this post has been taken by Ralf-Andre-Lettau. For full details click HERE


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4 responses

6 05 2008
समीर लाल

बहुत बढ़िया.

6 05 2008
राजीव रंजन प्रसाद

सुन्दर शब्द चयन, बेहतरीन रचना..

***राजीव रंजन प्रसाद

9 05 2008
Shubhashish Pandey

bahut he sunder aur shant bhav ki kavita
padh ke achha laga

6 12 2008
harshul

tum kitni khubsurat ho yee mere dil se puchho tum, in dhadkano se puchho tum kyu dil he tum pe diwana…

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