April 23, 2008...7:32 pm
चाँदनी की बातें
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कितना झीना है आज आसमाँ में चाँद,
निकलो बाहर तो एक नज़र देखना उसे ।
देखोगी इस नज़ारे को तुम जो आज,
तो जान जाओगी, कैसी दिखती हो मेरे खयालों में मुझे ।
“जहाँ हूँ मैं, जहाँ खडी़ हूँ मैं,
दिखता नहीं चाँद, देखती हूँ मैं” ।
मेरी नज़रें तुम आज़माओ, आओ करीब आ जाओ,
देखो मेरी बाहें थाम, ज़मीन पर भी नज़र आएगा चाँद ।
या एक छोटा सा करो यह काम,
आईना देखो अगर देखना है चाँद ।
“चाँद की रोशनी हूँ मैं,
चाँद के बिना अधूरी हूँ मैं” ।
तो मुझे बना लो अपना चाँद तुम,
सीने से लगा लो, सारी दुनिया में फ़ैल जाओ तुम ।
“तुम ही तो हो, वो तुम ही हो प्राण,
हमदम मेरे, तुम ही मेरे चाँद” ।







1 Comment
April 24, 2008 at 3:39 am
“चाँद की रोशनी हूँ मैं,
चाँद के बिना अधूरी हूँ मैं” ।
“very nice one,loved reading it ya”
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