April 8, 2008...7:05 pm
मिल जाऐं नज़रें तो है ये दरिया आग का
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कोई नज़रें मिलाने भी नही देता है,
हमारी नज़रों का रुख देख कर मुँह फेर लेता है ।
शायद यह सोच कर कि,
कहीं उसकी निगाहों की गहराई न नाप लें हम,
या कि यह सोच कर की,
हमारी निगाहों में भी वही गहराईयाँ न हों ।
पता नहीं कब तक चलेगा,
ये निगाहों का खेल,
और किस अन्जाम पर पहुँचेगा,
ये भी नहीं पता ।
पर चलने दो इसे,
है ये खेल आग का,
मिल जाऐं नज़रें
तो है ये दरिया आग का ।
जलूँगा ऐसे भी और
वैसे भी दहकेगा सीना,
ये हुआ तो जी लूँगा, और वो भी हुआ,
तो यह जीना भी है कौन सा जीना
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1 Comment
April 9, 2008 at 6:52 am
nigahon ka khel hamesha chalta hi rahega,bahut gehre bhav se bandhi sundar kavita hai,badhai.
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