फ़िर यूँ ही

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उसने मुझे “आप” कहना छोड़ दिया,
लगता है मेरी यारी परवान चढी़ ।

या रंगमंच के कारिंदे ने,
फिर कोई डोर खींची और छोडी़ ।

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अगर सुनो तो खामोशी में भी आवाज़ होती है,
नहीं तो चीखें भी तो खामोश होती हैं ।

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जब हम समझे हमें भूल गए वो
उनका हमें पैगाम आया |

जो रुक गयी थीं, वो सांसें चलीं,
जी में हमारे जी आया ।

~ by Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष on April 7, 2008.

3 Responses to “फ़िर यूँ ही”

  1. अगर सुनो तो खामोशी में भी आवाज़ होती है,
    नहीं तो चीखें भी तो खामोश होती हैं ।

    -सही है.

  2. ye chikhen wala sher bahut bahut badhiya hai badhai.

  3. बहुत ही अच्छे भाव है आप के …! लिखने का अंदाज़ भी बहुत अच्छा लगा.

    आप लिखते रहा हम यहाँ आते रहेंगे .. :)

    ***

    Bahut hi achhe bhav hai aap ke …! Likhne ka andaz bhi bahut achha laga.

    Aap likhte raha hum yahan aate rahenge .. :)

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