April 5, 2008...12:51 pm

फिर जी लूँ एक बार

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चल पड़े हम अपने रास्ते, मैं इधर, तुम उस ओर,
ज़िन्दगी किसी मोड़ पर तुम मुड़ गईं कहीं और ।

कभी बादलों से जब धूप की कोई किरण झांकती है,
किसी मोड़ पर तुम्हारे फिर मिल जाने की एक आस जागती है ।

एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार ।

अपने पैर घसीटते हुए कब तक चल पाऊंगा लगातार,
फट न पड़ें छाले, कहीं बैठ न जाऊं हो कर लाचार ।

मुझे बचा लेना ज़िन्दगी मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर,
मौत से पहले तुम्हें जी लेना चाहता हूँ एक बार ।

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2 Comments

  • bahut sundar

  • ” एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
    फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार । ”
    kiran hai kahin ek to andhakar na hoga ,sachcha hai agar vishwas toh sapna sakar zarur hoga - Fir jee lo ek Baar .

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