फिर जी लूँ एक बार

5 04 2008

चल पड़े हम अपने रास्ते, मैं इधर, तुम उस ओर,
ज़िन्दगी किसी मोड़ पर तुम मुड़ गईं कहीं और ।

कभी बादलों से जब धूप की कोई किरण झांकती है,
किसी मोड़ पर तुम्हारे फिर मिल जाने की एक आस जागती है ।

एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार ।

अपने पैर घसीटते हुए कब तक चल पाऊंगा लगातार,
फट न पड़ें छाले, कहीं बैठ न जाऊं हो कर लाचार ।

मुझे बचा लेना ज़िन्दगी मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर,
मौत से पहले तुम्हें जी लेना चाहता हूँ एक बार ।

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4 responses

5 04 2008
mehek

bahut sundar

5 04 2008
Samiksha

” एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार । ”
kiran hai kahin ek to andhakar na hoga ,sachcha hai agar vishwas toh sapna sakar zarur hoga – Fir jee lo ek Baar .

7 05 2008
उन्मुक्त

जितनी सुन्दर कविता, उतना सुन्दर चित्र

25 09 2008
rakesh murad

This poem was really nice & heart touching

Thanks
Rakesh Murad
rakeshmbd@gmail.com

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