हर ओर तू ही तू है,
हर चीज़ तेरी परछाई,
मैनें जहाँ जहाँ भी देखा,
बस तू ही तू नज़र आई ।
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April 23, 2008 • 7:51 pm 0
हर ओर तू ही तू है,
हर चीज़ तेरी परछाई,
मैनें जहाँ जहाँ भी देखा,
बस तू ही तू नज़र आई ।
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• 7:32 pm 1
कितना झीना है आज आसमाँ में चाँद,
निकलो बाहर तो एक नज़र देखना उसे ।
देखोगी इस नज़ारे को तुम जो आज,
तो जान जाओगी, कैसी दिखती हो मेरे खयालों में मुझे ।
“जहाँ हूँ मैं, जहाँ खडी़ हूँ मैं,
दिखता नहीं चाँद, देखती हूँ मैं” ।
मेरी नज़रें तुम आज़माओ, आओ करीब आ जाओ,
देखो मेरी बाहें थाम, ज़मीन पर भी नज़र आएगा चाँद ।
या एक छोटा सा करो यह काम,
आईना देखो अगर देखना है चाँद ।
“चाँद की रोशनी हूँ मैं,
चाँद के बिना अधूरी हूँ मैं” ।
तो मुझे बना लो अपना चाँद तुम,
सीने से लगा लो, सारी दुनिया में फ़ैल जाओ तुम ।
“तुम ही तो हो, वो तुम ही हो प्राण,
हमदम मेरे, तुम ही मेरे चाँद” ।
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April 14, 2008 • 2:09 pm 2
बहुत पहले लिखी थी यह कविता और साथ में यह भी लिखा था कि काश यह कविता अधूरी ही रहे हमेशा । एक अन्जान सा डर समा गया है दिल में, कहीं मेरा यह सपना भी अधूरा न रह जाए ।
मन रे, ये जो है तेरे भीतर की प्यास,
वैशाख में ज्यों हो श्रावण की तुझको आस ।
ज्यों कृष्ण पक्ष में पूर्ण चन्द्र को तरसे तू,
ज्यों नमी हवा में ढूंढे जब चलती हो लू ।
सूख चुकी छाती में जैसे ढूंढता पय शिशु,
सूने घर के द्वार खड़ा हो जैसे आस लगाए भिक्षु ।
ज्यों दुर्वासा से क्षमा की आस रखे अम्बरीष,
हथेली पर अपनी ज्यों थामना चाहे कोई गिरीश ।
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April 10, 2008 • 4:59 pm 3
सपने ये निगाहों के सच हों न हों,
ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों ।
ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में,
तेरे दिल में मेरे लिये जगह हो न हो ।
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April 8, 2008 • 7:05 pm 1
कोई नज़रें मिलाने भी नही देता है,
हमारी नज़रों का रुख देख कर मुँह फेर लेता है ।
शायद यह सोच कर कि,
कहीं उसकी निगाहों की गहराई न नाप लें हम,
या कि यह सोच कर की,
हमारी निगाहों में भी वही गहराईयाँ न हों ।
पता नहीं कब तक चलेगा,
ये निगाहों का खेल,
और किस अन्जाम पर पहुँचेगा,
ये भी नहीं पता ।
पर चलने दो इसे,
है ये खेल आग का,
मिल जाऐं नज़रें
तो है ये दरिया आग का ।
जलूँगा ऐसे भी और
वैसे भी दहकेगा सीना,
ये हुआ तो जी लूँगा, और वो भी हुआ,
तो यह जीना भी है कौन सा जीना
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April 7, 2008 • 6:12 pm 3
———-१———-
उसने मुझे “आप” कहना छोड़ दिया,
लगता है मेरी यारी परवान चढी़ ।
या रंगमंच के कारिंदे ने,
फिर कोई डोर खींची और छोडी़ ।
——–२———-
अगर सुनो तो खामोशी में भी आवाज़ होती है,
नहीं तो चीखें भी तो खामोश होती हैं ।
———३————-
जब हम समझे हमें भूल गए वो
उनका हमें पैगाम आया |
जो रुक गयी थीं, वो सांसें चलीं,
जी में हमारे जी आया ।
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April 6, 2008 • 6:55 pm 2
———१———–
क्या नाम दिया तुमने मुझको,
सारी बस्ती में कर दिया बदनाम मुझको ।
जो दिया ही है तो रखेंगे सम्भालकर इसको,
बहुत दिन हुए, किसी ने कुछ दिया नहीं ईनाम मुझको ।
——–२———–
किसी ने कहा -
नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा,
मेरी आवाज़ ही पहचान है, ग़र याद रहे ।
तो किसी ने कहा -
तुम्हारी आवाज़ भी तो ना सुन पाए मन भर के,
तुम्हारे लिखे खत ज़रूर याद रहेंगे ।
नाम गुमे दुनिया से या बदल जाए चेहरा,
तुम्हारा अक्स अपने ज़हन में रखेंगे सम्भाल के ।
—————————————-
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April 5, 2008 • 12:51 pm 4
चल पड़े हम अपने रास्ते, मैं इधर, तुम उस ओर,
ज़िन्दगी किसी मोड़ पर तुम मुड़ गईं कहीं और ।
कभी बादलों से जब धूप की कोई किरण झांकती है,
किसी मोड़ पर तुम्हारे फिर मिल जाने की एक आस जागती है ।
एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार ।
अपने पैर घसीटते हुए कब तक चल पाऊंगा लगातार,
फट न पड़ें छाले, कहीं बैठ न जाऊं हो कर लाचार ।
मुझे बचा लेना ज़िन्दगी मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर,
मौत से पहले तुम्हें जी लेना चाहता हूँ एक बार ।
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• 10:51 am 0
The Heart of your soul is what I want to discover,
Things which give you joy, I want to uncover.
Want to know what gives you a smile and a bother,
want to know you stranger
want to know you, and you I want to hear,
long it may take, but not always will you be a stranger.
Hey stranger, I know you will come here and this is for you. I have edited this a bit from the original.
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