March 28, 2008...7:39 pm
क्या करूं
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——–(१)——–
क्या करूं, क्या आत्मघात ?
कैसे कटे रात ?
कहीं तो समझे कोई
रोज मुझ पर रोती रात ।
मन में - भाव-शून्यता
या किंकर्तव्यविमूढ़ता
चहुं ओर शोर
हर कोई मुझे कोसता ।
——-(२)——-
क्या कुछ न खो दिया,
रंगों को भी तो धो दिया
हड्डीयों को भी तो हमने
कुरेद के देख लिया ।
अपना लहू भी बहा दूँ क्या,
कटार ही चला लूँ क्या,
पर बह गया सभी तो
जिस्म में जलेगा क्या ?







1 Comment
March 29, 2008 at 3:27 am
भावपूर्ण अभिव्यक्ति. बधाई.
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