क्या करूं

28 03 2008

——–(१)——–

क्या करूं, क्या आत्मघात ?
कैसे कटे रात ?
कहीं तो समझे कोई
रोज मुझ पर रोती रात ।

मन में – भाव-शून्यता
या किंकर्तव्यविमूढ़ता
चहुं ओर शोर
हर कोई मुझे कोसता ।

——-(२)——-

क्या कुछ न खो दिया,
रंगों को भी तो धो दिया
हड्डीयों को भी तो हमने
कुरेद के देख लिया ।

अपना लहू भी बहा दूँ क्या,
कटार ही चला लूँ क्या,
पर बह गया सभी तो
जिस्म में जलेगा क्या ?


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One response

29 03 2008
समीर लाल

भावपूर्ण अभिव्यक्ति. बधाई.

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