——–(१)——–
क्या करूं, क्या आत्मघात ?
कैसे कटे रात ?
कहीं तो समझे कोई
रोज मुझ पर रोती रात ।
मन में – भाव-शून्यता
या किंकर्तव्यविमूढ़ता
चहुं ओर शोर
हर कोई मुझे कोसता ।
——-(२)——-
क्या कुछ न खो दिया,
रंगों को भी तो धो दिया
हड्डीयों को भी तो हमने
कुरेद के देख लिया ।
अपना लहू भी बहा दूँ क्या,
कटार ही चला लूँ क्या,
पर बह गया सभी तो
जिस्म में जलेगा क्या ?
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March 23, 2008 • 12:08 pm
मित्र मेरे,
छोटा सा पत्र तुम्हें
लिख रहा हूं
आज होली है ।
जीवन है,
कई रंग हैं उसमें
एक रंग उसमे
तुमसे है ।
उस रंग जैसा,
दूजा रंग नहीं,
तेरा रंग
इतना जुदा सा है ।
written for some very special people in my life. It was Holi yesterday. I can see a few colours in my life, but will they stay, will they actually embrace me ?
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किसी ने लिख भेजी यह, एक छोटे से एस एम एस में, पता नहीं किसने लिखी है पर अच्छी लगी और कहीं भूल न जाऊं इसलिये :
फिर हमें क्यों तेरी देहलीज़ याद आ गयी,
जब लाखों खयाल सीढी़यां चढ़ते उतरते हैं ।
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