सुबह-सुबह घूम रहा था, गंगा के किनारे-किनारे,
देख रहा था बह चली कुछ रेत, तट के सहारे-सहारे ।
“ओह, कहां चल दीं तुम, तुमको ही रहा मैं देख”
कह,उठा, गाल पर लगा ली गंगा की कुछ गीली रेत ।
वह बोली ” रेणु हूं मैं, मुझमें क्या देखा तुमने,
पगतल में रहती हूं, मुझमें क्या देखा तुमने”?
“सरित प्रवाह में बहती हूं, दूर चली जाती हूं,
टूट बिखर कर बनी हूं मैं, मुझमें क्या देखा तुमने”?
“तुम शीतल हो”, बोला मैं, “भीतर से जलता हूं मैं,
भागीरथी सी तुम गंभीर, बिन जल मछ्ली तड़पता मैं।
“हो गंगा के संग बहती तुम, शिला की तरह डूबता मैं,
टूट कर भी बनी हुई हो, टुकड़े बन बिखरता मैं”।
“तुम कहती हो मुझसे – तुममें क्या देखा मैनें,
तुम्हारे ही शीतल स्पर्श से जीवन को जीता हूं मैं”।
चाहता हूं गिर कर तुझपर, तेरे सीने से लग जाऊं,
या उठाऊं हाथों में तुझको, शिरोधार्य बैठाऊं” ।
“निष्प्राण हो गिर जाऊं जब, कोई गंगा में बहा दे मुझे,
तिल-तिल कर टूटूं-बिखरूं, रेणु में मिल जाऊं मैं” ।
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behad sundar,jeevan aur renu ka milap ganga tat par hi hota hai.
very beautiful.