मां, तू जब न होगी कल

बहुत समय पहले बचकानी सी यह कविता लिखी थी, पर मां पर कविता बच्चे ही तो लिखेंगे। और जब बच्चे लिखेंगे तो वह बचकानी नहीं तो और क्या होगी? यह तब लिखी गयी थी जब मैं अपनी मां से दूर किसी और शहर में था और पता नहीं क्यों यह ख़याल आया कि कल अगर मेरी मां इस दुनिया में नहीं होगी तो क्या होगा | कविता पढे़ :

फिर बादल घनेरे घिर आये
मां की मेरी याद लाये
फिर तड़पा उसके आंचल को
उसके बोलों सी ठंडक ले आये

मां, तुम बादल सी मुझको लगती हो
तपते दिल पर ठंडक सी लगती हो,
बादल के बनते कई रूपों में
मेरे बचपन की कहानीयां लगती हो।

तुम्हारी कहानीयां याद आती हैं मां,
वो बंदर, शेर, खरगोश और मछ्लीयां,
आज फिर सो जाऊं तेरी गोद में,
मां फिर से मुझे वो कहानीयां सुना

जीवन मे जब न होगी तू कल
कैसे बीतेंगे मेरे वो पल,
चल मां, मेरी ऊंगली को पकड़
कुछ दूर साथ तू चल।

~ by Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष on January 9, 2008.

5 Responses to “मां, तू जब न होगी कल”

  1. बहुत सुन्दर भावनाएँ हैं ।
    घुघूती बासुती

  2. wonderful expression, ankhon ko nam kar gaee….khusnaseeb hain o log jo maan ke sath hain or jinko maan ka pyar mila hai.

  3. aapnki kavita main wo sahbd hain jo maa jaisi amoolyta ko paribhasith kar sake aap bahut age jayenge!

  4. ati komal aur sundar expression - maa is light and life indeed-selfless and caring always - epitome of unconditional love
    and compassion-

  5. man ko choo gai aapki kavita. few lines of my poem for sweet mother:-

    dharti ka savarg to maa hi hai
    is maa ki mamta ke aage
    bekunth dhaam, shiv lok to kya
    brahm lok bhi chota pad jaata
    pranaam karoon tujhko maata…………..seema

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