हमारे नौनिहाल - A poem that I posted on Ryze in a competition

Naunihaal

this is what I wrote, the requirement was to write a poem based on the above picture.

कन्ये कोमल तन पर
क्या बोझ ये लादे फिरती हो ?
दूसरों की फेंकी चीज़ों में
क्या जीवन तलाशा करती हो ?

क्या नन्हे तेरे पैरों मे
कांटे नहीं चुभते बच्ची ?
क्या जगत का स्वामी भूल गया,
नन्ही, तेरी उमर है कच्ची !

फटे, चीथड़ों से कपड़ों में,
ढांक रखा तूने निज पिन्जर,
क्यों देख नहीं चलता
मानवता के ह्र्दय पर ख़न्जर ?

आज अगर तुझ सी मेरी
एक छोटी सी बिटिया होती
तो हाल पर उसके ऐसे, पापों को मेरे,
कौन सी गंगा धोती ?

कन्या तुम भारत में क्या,
नवरातों मे ही पूजी जाती हो ?
और शेष दिनों, दूजों की फेंकी
जूठन का भोजन करती हो ?

विश्व अग्रणी बनने के भारत,
तेरे स्वप्नों को धिक्कार,
क्या ऐसे नौनिहालों का
कंधा ही होगा तेरा आधार ?

~ by Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष on December 21, 2007.

One Response to “हमारे नौनिहाल - A poem that I posted on Ryze in a competition”

  1. bahut bhav purn hai,dil tis gaya

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