May 6, 2008

निशा प्रिया

तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।

रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।

गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिर्विहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की, प्रिय की बाहों में पूर्ण,
कल तुम भी होगी मेरे आलिंगन में, मैं तेरे प्रेम में चूर्ण ।

The picture in this post has been taken by Ralf-Andre-Lettau. For full details click HERE

April 23, 2008

एक बार फिर यूँ

हर ओर तू ही तू है,
हर चीज़ तेरी परछाई,
मैनें जहाँ जहाँ भी देखा,
बस तू ही तू नज़र आई ।

April 23, 2008

चाँदनी की बातें

कितना झीना है आज आसमाँ में चाँद,
निकलो बाहर तो एक नज़र देखना उसे ।

देखोगी इस नज़ारे को तुम जो आज,
तो जान जाओगी, कैसी दिखती हो मेरे खयालों में मुझे ।

“जहाँ हूँ मैं, जहाँ खडी़ हूँ मैं,
दिखता नहीं चाँद, देखती हूँ मैं” ।

मेरी नज़रें तुम आज़माओ, आओ करीब आ जाओ,
देखो मेरी बाहें थाम, ज़मीन पर भी नज़र आएगा चाँद ।

या एक छोटा सा करो यह काम,
आईना देखो अगर देखना है चाँद ।

“चाँद की रोशनी हूँ मैं,
चाँद के बिना अधूरी हूँ मैं” ।

तो मुझे बना लो अपना चाँद तुम,
सीने से लगा लो, सारी दुनिया में फ़ैल जाओ तुम ।

“तुम ही तो हो, वो तुम ही हो प्राण,
हमदम मेरे, तुम ही मेरे चाँद” ।

April 14, 2008

प्यास और आस

बहुत पहले लिखी थी यह कविता और साथ में यह भी लिखा था कि काश यह कविता अधूरी ही रहे हमेशा । एक अन्जान सा डर समा गया है दिल में, कहीं मेरा यह सपना भी अधूरा न रह जाए ।

मन रे, ये जो है तेरे भीतर की प्यास,
वैशाख में ज्यों हो श्रावण की तुझको आस ।

ज्यों कृष्ण पक्ष में पूर्ण चन्द्र को तरसे तू,
ज्यों नमी हवा में ढूंढे जब चलती हो लू ।

सूख चुकी छाती में जैसे ढूंढता पय शिशु,
सूने घर के द्वार खड़ा हो जैसे आस लगाए भिक्षु ।

ज्यों दुर्वासा से क्षमा की आस रखे अम्बरीष,
हथेली पर अपनी ज्यों थामना चाहे कोई गिरीश ।

April 10, 2008

निगाहों के सपने - चाँदनी की आवाज़

सपने ये निगाहों के सच हों न हों,
ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों ।

ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में,
तेरे दिल में मेरे लिये जगह हो न हो ।

The picture in this post is a faithful photographic reproduction of an original two-dimensional work of art. The original image comprising the work of art itself is in the public domain for the following reason:

This image (or other media file) is in the public domain because its copyright has expired.

This applies to the United States, Canada, the European Union and those countries with a copyright term of life of the author plus 70 years.

For details of this picture click here

April 8, 2008

मिल जाऐं नज़रें तो है ये दरिया आग का

कोई नज़रें मिलाने भी नही देता है,
हमारी नज़रों का रुख देख कर मुँह फेर लेता है ।

शायद यह सोच कर कि,
कहीं उसकी निगाहों की गहराई न नाप लें हम,
या कि यह सोच कर की,
हमारी निगाहों में भी वही गहराईयाँ न हों ।

पता नहीं कब तक चलेगा,
ये निगाहों का खेल,
और किस अन्जाम पर पहुँचेगा,
ये भी नहीं पता ।

पर चलने दो इसे,
है ये खेल आग का,
मिल जाऐं नज़रें
तो है ये दरिया आग का ।

जलूँगा ऐसे भी और
वैसे भी दहकेगा सीना,
ये हुआ तो जी लूँगा, और वो भी हुआ,
तो यह जीना भी है कौन सा जीना

Public domain The image in this post is in the public domain because its copyright has expired.

This applies to the United States, Canada, the European Union and those countries with a copyright term of life of the author plus 70 years.

Click here for the more details of the picture

April 7, 2008

फ़िर यूँ ही

———-१———-
उसने मुझे “आप” कहना छोड़ दिया,
लगता है मेरी यारी परवान चढी़ ।

या रंगमंच के कारिंदे ने,
फिर कोई डोर खींची और छोडी़ ।

——–२———-

अगर सुनो तो खामोशी में भी आवाज़ होती है,
नहीं तो चीखें भी तो खामोश होती हैं ।

———३————-

जब हम समझे हमें भूल गए वो
उनका हमें पैगाम आया |

जो रुक गयी थीं, वो सांसें चलीं,
जी में हमारे जी आया ।

April 6, 2008

कुछ यूँ ही

———१———–

क्या नाम दिया तुमने मुझको,
सारी बस्ती में कर दिया बदनाम मुझको ।

जो दिया ही है तो रखेंगे सम्भालकर इसको,
बहुत दिन हुए, किसी ने कुछ दिया नहीं ईनाम मुझको ।

——–२———–

किसी ने कहा -
नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा,
मेरी आवाज़ ही पहचान है, ग़र याद रहे ।

तो किसी ने कहा -
तुम्हारी आवाज़ भी तो ना सुन पाए मन भर के,
तुम्हारे लिखे खत ज़रूर याद रहेंगे ।

नाम गुमे दुनिया से या बदल जाए चेहरा,
तुम्हारा अक्स अपने ज़हन में रखेंगे सम्भाल के ।

—————————————-

April 5, 2008

फिर जी लूँ एक बार

चल पड़े हम अपने रास्ते, मैं इधर, तुम उस ओर,
ज़िन्दगी किसी मोड़ पर तुम मुड़ गईं कहीं और ।

कभी बादलों से जब धूप की कोई किरण झांकती है,
किसी मोड़ पर तुम्हारे फिर मिल जाने की एक आस जागती है ।

एक किरण के दिख जाने से दूर नहीं होगा अन्धकार,
फिर इन्द्रधनुष बन जाने का सपना क्यों कर होगा साकार ।

अपने पैर घसीटते हुए कब तक चल पाऊंगा लगातार,
फट न पड़ें छाले, कहीं बैठ न जाऊं हो कर लाचार ।

मुझे बचा लेना ज़िन्दगी मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर,
मौत से पहले तुम्हें जी लेना चाहता हूँ एक बार ।

the picture above in this post is licensed under the Creative Commons Attribution ShareAlike license versions 2.5, 2.0, and 1.0
For the source of the image click here

April 5, 2008

Stranger

The Heart of your soul is what I want to discover,
Things which give you joy, I want to uncover.

Want to know what gives you a smile and a bother,
want to know you stranger

want to know you, and you I want to hear,
long it may take, but not always will you be a stranger.

Hey stranger, I know you will come here and this is for you. I have edited this a bit from the original.

Next Page »