Burning Ganga

21 09 2008

गंगा तुम क्यों जलती हो,
क्या उन पापों से जो धोए तुमने ?
या देख कर उन पापों को
जो होने को तैयार दिलों में ?





निशा प्रिया – २

6 09 2008

तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।

रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।

गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की श्याम वर्ण करती वरण,
मैं अनिमेष देखता युगल को परस्पर पाते शरण ।





निगाहों के सपने – चाँदनी की आवाज़

6 09 2008

यह लिख भेजा था उसने मुझे, चाँदनी ने !

सपने ये निगाहों के सच हों न हों,
ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों ।

ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में,
तेरे लिये दिल में मेरे लिये जगह हो न हो ।





इन्द्रधनुष का अन्धेरा कोना

4 09 2008

ए इन्द्रधनुष
रंग कई
तूने देखे
पर क्यों
तू स्याह रहा ?

क्यों तेरे
हर ओर सदा
रंग रहे
कई मगर
अंधियारे से तू घिरा रहा ?

देता है तू हरदम
और चाह
बहुत है पाने की
पर तुझको क्यों
कुछ नहीं मिला ?

ओस की बूँदें
किरण सूरज की
कुछ क्षणों
को मिलतीं हैं
तू बनता है

और खो जाता है
कुछ देर में
पता नहीं
कौन से
स्याह अन्धेरे कोने में





दिल तू दफ़न हो जा

4 09 2008

थोड़ा चुप रहो ए दिल
तुम क्यों बोल पड़ते हो बेवजह
तुम गलत होते हो सदा
हर मौके पर हर जगह ।

तुम्हें नहीं मौका
और ना तुम्हें हक है कोई
खामोश रहो और सुनो
हरदम सबकी कही ।

तुम बेजान बनो और
रहो दफ़न सदा
खाके बदन में मेरे बनकर
मुर्दे का सहारा मुर्दा ।





मैं न सुन पाया

27 07 2008

किस दुःश्चिन्ता में हृदय तुम्हारा
रेखाऎं कई तुम्हारे मुख पर उकेरता,
तुम कहतीं नहीं कुछ मुझसे
पर मैं रेखाऎं पढ़ सकता हूँ ।

पीड़ बैठी, नीढ़ बना हृदय में
मुस्कान से लीपती तुम उसे,
तुम आँखें बन्द रखा करो,
मैं खिड़कीयों से झाँक लेता हूँ ।

मेरे प्रेम से लिखे शब्दों को पढ़ कर,
जब तुम्हारे नयनों से बहा था नीर,
क्यों मैं यह नही कह पाया कि मैं
अश्रुओं का कहा सुन लेता हूँ ।





Nothing Remains !

29 06 2008

Nothing remains ! Everything changes; fragrances fade away, the Sun sets, and the day falls into night.

Everyone has a free will and not even God interferes there. Saints of all ages have preached; love liberates, it does not bind. God liberates, so why should I not ?

May their be peace in all hearts !





निशा प्रिया

6 05 2008

तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।

रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।

गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिर्विहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की, प्रिय की बाहों में पूर्ण,
कल तुम भी होगी मेरे आलिंगन में, मैं तेरे प्रेम में चूर्ण ।

The picture in this post has been taken by Ralf-Andre-Lettau. For full details click HERE





एक बार फिर यूँ

23 04 2008

हर ओर तू ही तू है,
हर चीज़ तेरी परछाई,
मैनें जहाँ जहाँ भी देखा,
बस तू ही तू नज़र आई ।





चाँदनी की बातें

23 04 2008

कितना झीना है आज आसमाँ में चाँद,
निकलो बाहर तो एक नज़र देखना उसे ।

देखोगी इस नज़ारे को तुम जो आज,
तो जान जाओगी, कैसी दिखती हो मेरे खयालों में मुझे ।

“जहाँ हूँ मैं, जहाँ खडी़ हूँ मैं,
दिखता नहीं चाँद, देखती हूँ मैं” ।

मेरी नज़रें तुम आज़माओ, आओ करीब आ जाओ,
देखो मेरी बाहें थाम, ज़मीन पर भी नज़र आएगा चाँद ।

या एक छोटा सा करो यह काम,
आईना देखो अगर देखना है चाँद ।

“चाँद की रोशनी हूँ मैं,
चाँद के बिना अधूरी हूँ मैं” ।

तो मुझे बना लो अपना चाँद तुम,
सीने से लगा लो, सारी दुनिया में फ़ैल जाओ तुम ।

“तुम ही तो हो, वो तुम ही हो प्राण,
हमदम मेरे, तुम ही मेरे चाँद” ।