
मेरी पीठ पीछे, शाम तुम ढली जाती हो,
मैं जानता हूँ कि तुम चली जाती हो,
फ़िसलते-लुढ़कते इस सूरज के साथ,
सामने से घिरी आ रही है रात ।
मगर रात भी तो मेहमान है
बस रात भर की ही, चली जाएगी,
जैसे जीवन में आते-जाते हैं सुख-दु:ख,
जन्म मृत्यु, यौवन-बुढ़ापा, श्वास-नि:श्वास ।
सुहानी शाम तुम रात में अंगडा़ईयाँ ले कर
कल सुबह की गोद में दम तोड़ दोगी,
कल शाम मैं किसी और शाम के साए में,
यूँ तस्वीर खिंचाता नज़र आऊंगा ।
या जाने, कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ ।
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