स्याह इंद्रधनुष और चाँदनी रातें

I think therefore I am …… I think !!! Cut the crap, I am here to write so that I get loads of traffic and I feel important ……

कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ ।

Shaam

मेरी पीठ पीछे, शाम तुम ढली जाती हो,
मैं जानता हूँ कि तुम चली जाती हो,
फ़िसलते-लुढ़कते इस सूरज के साथ,
सामने से घिरी आ रही है रात ।

मगर रात भी तो मेहमान है
बस रात भर की ही, चली जाएगी,
जैसे जीवन में आते-जाते हैं सुख-दु:ख,
जन्म मृत्यु, यौवन-बुढ़ापा, श्वास-नि:श्वास ।

सुहानी शाम तुम रात में अंगडा़ईयाँ ले कर
कल सुबह की गोद में दम तोड़ दोगी,
कल शाम मैं किसी और शाम के साए में,
यूँ तस्वीर खिंचाता नज़र आऊंगा ।

या जाने, कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ ।

Filed under: दर्शन , , , , , ,

हाट – The Sunday Market

Village Haat

सुबह से ले के शाम तक,
जूतों से ले के गेहूं- दाल तक,
सब खरीदते-बेचते हैं ठाठ में
भीड़ भरी इतवार की हाट में ।

वहां चने भी हैं और खिलौने लकड़ी के,
मई मे जहां लगते हैं ठेले ककडी़ के,
सिक रहीं हैं मूंगफलीयां चटर-चटर
बिक रहे किलो के भाव से मटर।

लाल पीली बंधी सिरों पे पगडी़यां ,
चल रही डाल पैरों में जूतीयां
एक तीली से जला रहे दो बीड़ीयां,
ठंड है, खरीद रहे सस्ती सिगड़ीयां ।

हंस रहा है कालू और उसका बाप भी,
जब नाचे बंदर लय में ढोलक के थाप की ।
समेट रहे कुछ सामान, कुछ गिन रहे दिहाडी़,
कुछ चल पडे़ हैं पकड़ने गांव की गाड़ी।

कई चल पडे़ संजो के हफ़्ते भर के सपने,
पल जाऐंगे सात दिन कुटुम्बी और अपने ।
सब खुश हैं कर ली है एक और हफ़्ते की जुगाड़,
सब आज में ही जीते हैं, जीवन नहीं पहाड़ ।

The above photograph is a copyright of Rakesh Ranjan, it is reproduced here with his permission. Click here or photograph to visit the source.

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, कविता , , , , ,

ज़िन्दगी पर दो

——पहली——

(जोगिन्दर साहब, आप से आज हुई बातों से प्रेरित । आपके आगरे के घर की दीवारों पर उभर आई पपड़ीयों को समर्पित)

दबे पैर निकली जा रही हो,
तुम तेज़ रफ़्तार से चलकर
मेरे कदमों के नीचे से
चुपचाप – ज़िन्दगी ।

ज़रा रुको तो, दम तो लो,
अभी बचपन भी नहीं जीया,
कहानीयां सब सुनी नहीं,
नहीं खेला खेल जी भरकर अभी ।

सपने देखे भी नहीं रंगीं,
मन भर नहीं हुई होली-दिवाली,
पिता के कंधों पर बैठ दशहरे पर
अभी देखने हैं जलते रावण कई ।

तुम तो चली जा रही हो,
मुड़ कर भी क्या देखोगी नहीं?
मुझे पसन्द थे वो दिन,
मगर वो तो तुम लौटाओगी नहीं !

यौवन भी बीता जाएगा,
तेरा चक्र चलता जाएगा,
पता नहीं कहाँ पहुँचूंगा मैं,
जाने तू कहाँ ले जाएगी ।

अधेड़ से बूढ़ा फिर एक याद,
फिर तो राख भी खो जाएगी,
क्या उसके बाद भी है कोई सफ़र
वक्त की धार ही बताएगी ।

——–छोटी सी दूसरी——-

मैं क्या करूँ, तेरा क्या करूँ,
तेरे साथ मैं ऐसा क्या करूँ
कि जब तू न रहे तो भी यह रहे
मैनें तेरे साथ, ज़िन्दगी, इन्साफ़ किया ।

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, कविता , , , , ,

एक अच्छी लघु कथा

एसे ही इन्टर्नेट पर घूमते घूमते एक अच्छी सी लघु कथा पढ़ने को मिलि, आप का ध्यान भी आकर्षित करना चाहूंगा :

(This is meant for you even if you have been redirected here from my tweet)
पश्चाताप

Filed under: Uncategorized , , , ,

-माँ-पा

कल अपने ब्लॉग पर लिखि कविता का लिंक भेजा था आपको, आपने जवाब में ये भेजा :

प्यारे बेटे,
हमने देखा, हमने सुना, हमने पढा …….
समझें कैसे अपने बेटे को ! ! !

-माँ-पा

———————————————-
मैं आपको बता देना चाहता हूं कि आप ने मुझे वो सब कुछ दिया जो आप दे सकते थे और जो मुझे चाहिये था । मेरे जीवन कि एक उपलब्धि यह है कि मैं आपके साथ रहता हूं, यह उपलब्धि इसलिये है क्योंकि लाखों बेटे इस दुनिया में एसे हैं जो अपने माता पिता के साथ किसी कारण से या किसी बहाने से नहीं रह पाते ।
और अगर आप यह जानना चाहते हैं कि मुझे आप से और क्या चाहिये तो मेरा आपको जवाब यह है कि आपका मुझे “प्यारे बेटे” कह देना मेरे लिये अनंत को पा जाने के बराबर है ।
भीगी आंखों से मैं आपको यह संदेश एसी जगह पर दे रहा हूं जहां इसे कई लोग पढ़ेंगे, सो पढें वो भी और आप भी कि आप से अधिक मुझे और कुछ नहीं चाहिये ।

Filed under: Uncategorized ,

कमीने (फ़िल्म नहीं, मेरी कविता)

मैं भी भूल गया वो बात,
तुम भी भूले ही होगे
अपने आप से किए हुए ऐसे वादे,
अपना जीवन समर्पित कर देने के ।

समर्पण, विपन्न बीलकों का जीवन
संवार देने में स्वयं का,
या आश्रय देने का निराश्रित
कई बडे़-बूढों को कहीं पर ।

वादे, जो किये थे हमने
अपने आप से हर बार,
चाय की दुकान पर अपने आगे हाथ फैलाए
नन्हे हाथों को देख कर ।

इरादे, जो बनाए थे हमने
४० में रिटायर हो जाने के, और,
शहर से दूर किसी पहाड़ पर हरियाली में
बच्चों के लिये मुफ़्त स्कूल खोलेने के ।

शर्म आयी होगी तुमको भी
रेल्वे की कोच में घुटनों पर रेंग के,
झाड़ू लगा भीख मांगने वाले को देख,
अपने पास इतना कुछ होने पर ।

फिर सोचा होगा तुमने जानबूझ कर,
कल की मीटिंग के बारे में,
ऑफ़िस, नये खुले मॉल के बारे में,
और किया होगा एक वादा फिर से ।

वादा ४० में रिटायर होने का,
स्कूल का, वृद्धाश्रम का,
सोचा होगा नन्हें भिखारी हाथों के बारे में,
और चल दिये होगे आगे – कमीने ।

Filed under: Kavita, Poetry, Random Thoughts, voice, कविता , , , , , ,

ओ नंगे !!!

ओ नंगे ! हां तुम…… तुम नंगे,
अरे! फिर भी पढ़े जा रहे हो तुम अभद्र
नहीं मानोगे क्या तुम ?
तो सुनो तुम मनुष्य निर्वस्त्र !

तुम नग्न हो क्योंकि निर्लज्ज,
कह तो दिया, निर्लज्ज हो तुम,
मनुष्यों का अनादर करने में
दम्भी, आनन्द पाते हो तुम ।

रखो हृदय पर हाथ, सत्य कहो,
अधीनस्तों का अभिमानवश
दमन कर तुमने क्या,
नहीं छुआ अभिमान का उत्कर्ष ?

क्या तुम ठीक वैसे ही नहीं हो,
नगर भ्रमण करते नग्न विक्षिप्त से,
अपने आप ही हंसते हुए
मैले से, नंगे, सब लोगों मे घृणित से ?

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, voice, आवाज़, कविता , , , ,

Every night when I touch you my child

Every night when I feel you with my hand,
In your mother’s womb when you flick and bend,
I touch her belly where I can feel you move,
I can feel you; can you feel me too ?

My little one I await you to come,
to take you in arms – my good-luck charm,
to come back home from worldly bother,
to kiss you only as can a father.

Filed under: Child, English Poetry , ,

Burning Ganga

गंगा तुम क्यों जलती हो,
क्या उन पापों से जो धोए तुमने ?
या देख कर उन पापों को
जो होने को तैयार दिलों में ?

Filed under: Photographs, voice, कविता , , ,

निशा प्रिया – २

तुमसे दूर यहाँ भी साँझ ढलती है,
रात के किनारे पर अब टहलती है ।
उसके आँचल में बँधा तुमसे दूरी का अहसास,
बढ़ता जाता है, छोड़ती वह गहरे प्रश्वास ।

रात्रि में मिल जाने को तत्पर शाम,
खुद पर ओढ़ती हुई धीरे से रंग श्याम,
मेरे चारों ओर रात्रि का करती आलिंगन,
उदित होता पीतवर्ण पूर्ण चन्द्र; तेरा कंगन ।

गिर कर मुझपर बहतीं चन्द्रकिरणें मुक्ताभ,
मैं ज्योतिहीन; नहीं तेरे स्निग्ध आलिंगन की आभ ।
साँझ शरण श्याम निशा की श्याम वर्ण करती वरण,
मैं अनिमेष देखता युगल को परस्पर पाते शरण ।

Filed under: Hindi Poetry, Kavita, Poetry, कविता

स्याह इन्द्रधनुष – चांदनी रात

प्रियवर, इस ब्लॉग का प्रयोग मैं अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिये करता हूं और आप का स्वागत है मेरे अन्दर झांक कर देख लेने के लिये ।
आम तौर पर मैं कविता के माध्यम से अपने आपको व्यक्त करता हूं, मैं हिंदी का पंडित नहीं हूं, त्रूटि हो जाने पर कृपया उसे मेरे ध्यान में लायें एवं मुझे क्षमा करें ।

Watch videos at Vodpod and other videos from this collection.

Kerala - God's Own Country

DSC00884

DSC00716

DSC00691

More Photos

Death – By Grey Rainbow

There is so much that we think we will be able to do in this life,
there is so much we want to believe we will accomplish.
And then comes death, suddenly, it comes to the person closest to your heart.
There is nothing after that, no dreams, no desires, there is nothing to be accomplished. One thing remains :
TIME - and you don't know how to kill it.

GOD

इस घट अन्तर बाग बगीचे,
इसी में सिरजनहारा|
इस घट अन्तर पारस मोती,
इसी में नौ लख तारा|
इस घट अन्तर सात समन्दर,
इसी में उठत फ़ौव्वारा|
इस घट अन्तर अनहत गूंजे,
इसी में सांई हमारा|

Kabir - God lives within, not without

कारवां गुज़र गया

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

(c) - श्री गोपाल दास नीरज ।

Blog Stats

  • 6,791 hits

Add This

Bookmark and Share

Me On Twitter

  • कल तस्वीर में मैं रहूँ, न रहूँ http://wp.me/p9oRG-3sस्याह - रंगीन2 months ago
  • When was it that you travelled in an Autorickshaw for 5 km and the auto walla demamnded on 5 Bucks ? For me it was todayस्याह - रंगीन2 months ago
  • Just posted this हाट - The Sunday Market http://wp.me/p9oRG-2Yस्याह - रंगीन2 months ago
  • @kumarmukul जी बहुत अच्छे, मेरी दाद कवि तक पहुँचाने का कष्ट करें । धन्यवाद !!!स्याह - रंगीन2 months ago
  • @kumarmukul मुकुल साहब आज रायपुर आना हुआ और आपका कविता पढ़्ना भी। अच्छा लिखा है आपनेस्याह - रंगीन2 months ago